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गाय व भैंस विकास कार्यक्रम

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गाय व भैंस विकास :-



पहाड़ी गाय की नस्ल सुधार कार्यक्रम के माध्यम से उसकी उत्पादन क्षमता में सुधार लाया जा रहा है | नस्ल सुधार कार्यक्रम के तहत जर्सी तथा होलस्टीन बैलों को प्रयोग में लाया जाता है ताकि जर्म प्लाज्म का वांछित स्तर कायम रखा जा सके | गाय व भैंसों में कृत्रिम गर्भाधान प्रणाली अपनाई जा रही है | प्रदेश में तीन फार्म कोठीपुरा (बिलासपुर), पालमपुर (कांगड़ा), बागथान (सिरमौर) में विभाग द्वारा चलाये जा रहे हैं, जहाँ पर उत्तम किस्म के प्रजनक बै़लों को तैयार किया जाता है | इन उत्कृष्ट बैलों का प्रयोग विभाग के पालमपुर स्थित वीर्य केन्द्र में हिमान्कित वीर्यतृण के उत्पादन हेतु प्रयोग में लाया जा रहा है |

 

 

कृत्रिम गर्भाधान की सुविधा प्रदेश के 2084 चिकित्सा संस्थानों के माध्यम से प्रदेश के पशुपालकों को उपलब्ध करवाई जा रही है | जहाँ तक अति दूर-दराज क्षेत्रों का प्रश्न है वहां कृत्रिम गर्भाधान तकनीक का प्रयोग करना लगभग असम्भव है इसलिए विभाग ने नस्ल सुधार कार्यक्रम को इन क्षेत्रों में सुदृढ़ करने हेतु प्राकृतिक गर्भाधान की प्रणाली को अपनाया है जिससे उत्कृष्ट किस्म के पशु प्राप्त हो रहे हैं | इसके अतिरिक्त नस्ल सुधार कार्यक्रम को और गति देने हेतु विभाग ने हिमाचल प्रदेश पशुधन विकास बोर्ड का भी गठन किया है | जिसके लिए भारत सरकार द्वारा 14.15 करोड़ रु की सहायता राशि 5 वर्षों के लिए (2007-12) उपलब्ध करवाई है जिसके 2012-13 में भी जारी रहने की उम्मीद है | इस सहायता राशि का उपयोग प्रदेश में कृत्रिम गर्भाधान की सुविधा को और सुदृढ़ करने में किया जा रहा है | विभाग का लक्ष्य है कि शीघ्र ही प्रदेश की समस्त प्रजनन योग्य गाय व भैंसों को कृत्रिम गर्भाधान के कार्यक्रमों के अंतर्गत लाया जाए |

 

पहाड़ी बैलों का बधियाकरण किया जा रहा ताकि अधिक से अधिक गायों का नस्ल सुधार सुनिश्चित किया जा सके |

 

विभाग की प्रजनन नीति के अनुसार, विदेशी जर्सी/होलस्टीन का अनुवांशिकी स्तर 50% तथा शेष 50% अनुवांशिकी स्तर पहाड़ी/देसी नस्ल के गायों का निश्चित किया गया है | इस नीति से विदेशी नस्ल की अधिक दुग्ध उत्पादन क्षमता के साथ-साथ पहाड़ी नस्ल की गायों से अधिक रोग निरोधक क्षमता के गुणोंवाली सुधरी हुई नस्ल की बछड़ी प्राप्त की जा सकती है | प्रदेश में कृत्रिम गर्भाधान की प्रणाली को अपनाने से दुग्ध उत्पादन बढकर 210 से 1102.494 हजार टन पंहुच गया है जबकि वर्ष 2001-02 में यह केवल 762.864 हजार टन दर्ज किया गया था |

 

1. प्रदेश के फार्मों में पशुपालकों को प्रशिक्षण की सुविधा उपलब्ध करवाई जा रही है ताकि वे नए वैज्ञानिक तरीकों से पशुओं का पालन-पोषण कर सके |

 

2. फार्मों से अधिशेष बैलों को प्रदेश के दूर-दराज क्षेत्रों में प्रकृतिक गर्भाधान हेतु उपलब्ध करवाया जा रहा है |

 

3. इच्छुक पशुपालकों को फार्मों से अधिशेष गायों को मूल्याधार पर उपलब्ध करवाया जाता है |

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Visitor No.: 04489308   Last Updated: 13 Jan 2016