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अगस्त (32 से 35 सप्ताह)
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- धान में रोपाई के 4-5 सप्ताह बाद यूरिया क्रमशः अधिक उपज व स्थानीय किस्मों में 4 एवं 2.25 कि.ग्रा./बीघा की तीसरी में मात्रा डालें|
- धान के प्रत्येक खेत में पानी खड़ा रखें| दीजियां निसरने और फूल की अवस्था पर 5-7 दिन के लिए खेत से पानी निकाल दें|
- धान में ब्लास्ट रोग के नियन्त्रण हेतु पहले लिखे गये (जुलाई माह के अन्तर्गत) फफूंदनाशकों का छिड़काव करें|
- मक्की, सूरजमुखी एवं फलीदार फसलों में फालतू पानी के निकास का उचित प्रबंध करें|
- मक्की में नरफूल (टेसल) निकलने से पहले अधिक वर्षा वाले क्षेत्रों में संकर व कम्पोजिट किस्मों एवं स्थानीय किस्मों में यूरिया या कैन क्रमशः 7 या 12.7 एवं 4.7 या 8.3 कि.ग्रा./बीघा डालें| कम वर्षा वाले क्षेत्रों में यह मात्रा क्रमशः 5 या 9.7 एवं 3.3 या 6.3 कि.ग्रा./बीघा डालें| बेबीकार्न में यूरिया या कैन की मात्रा क्रमशः 8.7 या 16.0 कि.ग्रा./बीघा रखें|
- मक्की की फसल में फुलणु, साल के पत्ते, बसूटी या कोई अन्य स्थानीय घास-फूस 8 कि.ग्रा./बीघा डालने से भूमि की नमी बनी रहती है जो बारानी खेती में गेहूं की बीजाई में सहायक होती है|
- नर व मादा फूल आने की अवस्था में मक्की की फसल में नीला फुलणु (एक वर्षीय प्रजाति) की रोकथाम के लिए एट्राजिन 50 डब्ल्यु.पी. 120 मि.ली./बीघा का छिड़काव 60-64 लीटर पानी में खरपतवार की 2-3 पत्ती आने पर करें|
- बेबी कार्न के भुट्टों में रेशमी बाल निकलने के 2-3 दिन बाद तोड़ लें| ध्यान रखें कि तने का ऊपरी भाग तथा निचला पत्ता ना टूटे|
- माश, मूंग व कुल्थी में खरपतवार नियन्त्रण का कार्य करें|
- दलहनी फसलों जैसे माश, मूंग, व अरहर में धारीदार भृगों के आक्रमण से बचाव के लिए पूर्व वर्णित कीटनाशकों का छिड़काव करें| अरहर में फलीछेदक सुंडियों के प्रकोप का भी ध्यान रखें तथा आवश्यकता होने पर 90 मि.ली. एन्डोसल्फॉन 35 ई.सी. का 60 लीटर पानी में घोल बनाकर प्रति बीघा क्षेत्र में छिड़काव करें|
- यदि सूरजमुखी की फसल कमजोर दिखाई दें तब 4.5 कि.ग्रा. यूरिया या 6.4 कि.ग्रा. कैन प्रति बीघा डालें| फसल में निराई-गुड़ाई व गिरने से बचाने के लिए मिट्टी चढ़ाने का कार्य करें|
- तिल में महीने शुरू में एक निराई-गुड़ाई करें व आवश्यकता से अधिक पौधों को निकाल दें| निराई-गुड़ाई के बाद यूरिया या कैन (5.2 या 9.6 कि.ग्रा./बीघा) डालें|
- यदि गन्ने की फसल में पैरिला नामक कीट का प्रकोप हो तो 80 मि.ली. मैथालियान 50 ई.सी. या 80 मि.ली. एन्डोसल्फॉन 35 ई.सी. को 80 ली. पानी में घोल कर प्रति बीघा छिड़काव करें|
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चारे की फसलें
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- खरीफ मक्की की नरफूल/ज्वार एवं बाजरा/मकचरी में यूरिया या कैन क्रमशः 3.5 या 6.4 व 3.9 या 7.2 कि.ग्रा./बीघा डालें|
- ज्वार में बीजाई से 60 दिन पहले या फूल आने तक पशुओं को न खिलायें|
- फालतु चारे को सूखी घास में बदल लें या साईलेज बना लें ताकि कमी वाले समय में खिलाया जा सकें|
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सब्जियां
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निचले पर्वतीय क्षेत्र
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यह समय फूलगोभी की दरम्याना किस्मों (अघहेणी, पूसी, पालम उपहार, इम्प्रूवड जापानीज) की पनीरी उगाने के लिए उपयुक्त है| पनीरी के लिए तीन मीटर लम्बी, एक मीटर चौड़ी तथा 10-15 सैं.मी. ऊंची क्यारियों में 20-25 कि.ग्रा. खूब गली-सड़ी गोबर की खाद, 200 ग्रा. सिंगल सुपर फास्फेट, 15-20 ग्राम इण्डोफिल एम. 45 तथा 20-25 ग्राम थीमेट या फोलीडॉल धूल मिट्टी की ऊपरी सतह में मिलाने के उपरान्त कतारों में 5 सैं.मी. की दूरी पर बीज की पतली बीजाई करें| पनीरी उगाने के लिए पोलीहाऊस या प्लास्टिक की छोटी-छोटी सुरंगों का प्रयोग करें ताकि अधिक वर्षा से पौधे खराब न हो|
- गोभी की पनीरी को कमरतोड़ रोग से बचाने के लिए नर्सरी की क्यारियों को बुआई से 20 दिन पूर्व फार्मलीन (1 भाग फार्मलीन 7 भाग पानी) द्वारा शोषित करें तथा बीज को 30 मिनट तक पानी में भिगोने के बाद 30 मिनट तक गर्म पानी (52” सेल्सियस) में भिगो लें तथा पुन: 30 मिनट तक स्ट्रेप्टोसाईक्लीन (1 ग्रा. प्रति 10 लीटर पानी) के घोल में रखें|
- हरा प्याज उगाने के लिए छोटी-छोटी गांठों (सेंट) की रोपाई पंक्तियों में सैं.मी. तथा गांठों से गांठों के बीच 5-8 सैं.मी. की दूरी रखकर ऊंची क्यारियां बनाकर या मेढ़ों पर इन गांठो की रोपाई की जा सकती है|
- इस महीने के दूसरे पखवाड़े में फ्रांसबीन की बौनी एवं सुधरी किस्मों (कन्टेडर, प्रीमियर, पूसा पार्वती, अर्का कोमल) की बीजाई पंक्तियों में 30-45 सैं.मी. तथा पौधों में 10-15 सैं.मी. की दूरी पर की जा सकती है| खेत तैयार करते समय 16 क्विंटल गोबर की गली-सड़ी खाद तथा बीजाई के समय 16 कि.ग्रा. कैन, 40 कि.ग्रा. सिंगल सुपर फास्फेट तथा 7 कि.ग्रा. म्यूरेट ऑफ पोटाश प्रति बीघा जबकि संकर किस्मों की रोपाई के समय 24 कि.ग्रा. कैन, 60 कि.ग्रा. सिंगल सुपर फास्फेट तथा 7 कि.ग्रा. म्यूरेट ऑफ पोटाश प्रति बीघा खादों का मिश्रण खेतों में डालें|
- टमाटर की तैयार पौधे की रोपाई 60x45 सैं.मी. (साधारण किस्मों) तथा 90x30 सैं.मी. (संकर किस्मों) कतारों से कतारों एवं पौधों से पौधों की दूरी पर समतल खेतों या मेढ़ें बनाकर की जा सकती है| खेत तैयार करते समय 40 क्विंटल गोबर की गली-सड़ी खाद तथा साधारण किस्मों की रोपाई के समय 16 कि.ग्रा. कैन, 40 कि.ग्रा. सिंगल सुपर फास्फेट तथा 7 कि.ग्रा. म्यूरेट ऑफ पोटाश प्रति बीघा जबकि संकर किस्मों की रोपाई के समय 24 कि.ग्रा. कैन, 60 कि.ग्रा. सिंगल सुपर फास्फेट तथा 7 कि.ग्रा. म्यूरेट ऑफ पोटाश प्रति बीघा खादों का मिश्रण खेतों में डालें|
- बन्दगोभी एवं गांठगोभी की पौधे की रोपाई पंक्तियों में 45-60 सैं.मी. तथा पौधों में 30-45 सैं.मी. की दूरी पर की जा सकती है|
- इसी महीने बन्दगोभी की सुधरी किस्मों (गोल्डन एकड़, प्राईड आफ इण्डिया, पूसा मुक्ता) तथा गांठगोभी (व्हाईट वियाना, परपल वियाना पालम टेन्डर नोव) की पनीरी भी उगाई जा सकती है|
- विभिन्न सब्जियों में कीट व बिमारियों के प्रकोप से बचाव के लिए रोग प्रभावित पौधों को कॉपर-ऑक्सीक्लोराइड-50 (30 ग्रा. प्रति 10 लीटर पानी) से सींचें|
- दूसरे पखवाड़े में जड़दार सब्जियों जैसे मूली (जापानीज व्हाईट, चाईनीज पिंक, मीनो अर्ली), गाजर, (पूसा केसर, नान्तीज, चान्तनी) तथा शलगम (पी.टी.डब्ल्यु.जी.) की सीधी बीजाई पंक्तियों में 20-25 सैं.मी. तथा पौधों में 5-7 सैं.मी. की दूरी पर करें| खेत तैयार करते समय 8 क्विंटल गोबर की गली-सड़ी खाद तथा बीजाई के समय 16 कि.ग्रा. कैन, 25 कि.ग्रा. सिंगल सुपर फास्फेट तथा 5 कि.ग्रा. म्यूरेट ऑफ पोटाश प्रति बीघा खादों का मिश्रण खेतों में डालें|
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मध्य पर्वतीय क्षेत्र :
- फूलगोभी की तैयार पौधे की खेतों में 60x45 सैं.मी. की दूरी पर रोपाई करें| खेत तैयार करते समय 15-20 क्विंटल गोबर की गली-सड़ी खाद तथा रोपाई के समय 20 कि.ग्रा. कैन, 38 कि.ग्रा. सिंगल सुपर फास्फेट तथा 10 कि.ग्रा. म्यूरेट ऑफ पोटाश प्रति बीघा खेतों में डालें|
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ऊंचे पर्वतीय क्षेत्र :
- बन्दगोभी की फसल में निराई-गुड़ाई करें तथा नत्रजन (3-4 कि.ग्रा. यूरिया या 6-8 कि.ग्रा. कैन प्रति बीघा) फसल में डालें|
- मणडीकरण योग्य सब्जियों की पैदावार का सही समय पर तुड़ान करें तथा अच्छी श्रेणीकृत पैदावार की उचित पैकिंग करने के उपरान्त मणडीकरण करें|
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