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विषाणु जनित रोग
मुहं व खुर की बीमारी
- यह बीमारी सूक्ष्म विषाणु के कारण पैदा होती है। इसके स्थानीय नाम निम्नलिखित है।
(1) खरड़ू (2) मुहँ पका-खुर पका (3) चपका (4) खुरपा आदि।
यह बीमारी भैंस, भेड़, बकरी, ऊँट और सुअर आदि पशुओं में होती है। छूतदार रोग होने की वजह से यह बहुत तेज़ी से फैलती है। यह रोग बीमार पशु से सम्पर्क करने से, पानी, घांस, दाना, बर्तन, दूध निकलने वाले व्यक्ति के हाथों से, हवा से तथा लोगों के आवागमन से फैलता है।
रोग ग्रस्त पशु को 104-106 डी॰फरे न हायट, बुखार हो जाता है। तेज़ बुखार के बाद पशु के मुहँ के अनदर, गालों, जीभ, होंठ, तालू व मसुड़ों के अन्दर, खुरों के बीच तथा कभी-कभी थनों व अयन पर छाले पड़ जाते है। छाले फ़टने के करण पशु को बहुत दर्द होता है। और पशु खाना-पीना बन्द कर देता है। पशु लंगड़ा कर चलने लगता है। मुहँ से लार आने लगती है। दूध उत्पादन गिर जाता है। पशु कमजोर हो जाता है। गर्भवती मादा में कई बार गर्भपात भी हो जाता है। बैलों की कार्यक्षमता कम हो जाती है।
इस रोग का कोई विशेष उपचार नहीं हैं। परन्तु लक्षणों के आधार पर उपचार के लिए एन्टी वायोंटिक टीके लगाए जाते है। मुहँ में बोरो-गिलिसरीन तथा खुरों में किसी एंटीसेप्टिक लोशन या क्रीय का प्रयोग किया जाता हैं।
बचाव :-
इस बीमारी में बचाव के लिए पशुओं को पोलिवेलेट वेक्सीन के वर्ष में दो बार टीके आवश्य लगवाने चाहिए। पहला टीका एक माह की उमर में, दूसरा तीसरे महीने में और तीसरा ६ माह की उम्र में तथा फिर हर साल दो बार टीके आवश्य लगवाने चाहिए।
बीमारी हो जाने पर बीमार पशु को स्वस्थ पशुओं से अलग रखना चाहिए। तथा उनकी देखबाल करने वाले व्यक्ति को भी स्वस्थ पशु से दूर रहना चाहिए। और बीमार पशु के आवाम्मन पर रोक लगनी चाहिए। रोग ग्रस्त क्षेत्र से पशु नही खरीदने चाहिए।
पशुशाला को साफ़ सुथरा रखना चाहिए। और मरे पशु के शव को दबा देना चाहिए।
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पशुओं में पागलपन या हकलाने का रोग यानि रेबीज
यह रोग सूक्ष्म विषाणु जोकि हलकाये कुत्ते, बिल्ली, बन्दर, गिदड़, लोमड़ी या नेवले के काटने से स्वस्थ पशु के शरीर में प्रवेश करते है। तथा नाडियों द्वारा मस्तिष्क में पहुंच कर बीमारी के लक्षण पैदा करते हैं। यह बीमारी मनुष्यों में भी आ सकती है। इसलिए इस वजह से भी इस बीमारी का विशेष महत्व है। रोग हो जाने के उपरांत इसका कोई भी इलाज नहीं है। तथा रोगी पशु की मृत्यु निश्चित है यह रोग विषाणु के शरीर में प्रवेश करने के 10 दिन में 210 दिन की अवधि में हो जाता है।
यह बीमारी दो रूपों में देखी जाती है। (1) पहला जिसमें पशु काफी भयानक और उग्र रूप में हो जाता है। तथा लक्षण स्पष्ट दिखाई देते है। (2) दूसरा, जिसमें पशु शांत रहता है तथा लक्षण नहीं के बराबर होते हैं।
कुत्तों में उनकी आंखें अधिक तेज़ व लाल नज़र आती हैं। बेचैनी बढ़ जाती है। चिड-चिडापन आ जाता है। कस्निक वस्तुओं की इधर-उधर तेज़ी से दौड़ने लगता है। और रास्ते में जो भी मिले उसे काटता है। पशु के गले में लवण होने से आवाज़ बदल जाती है। कंपकंपी, लडखडाहट, और लम्बा होने से अचेंतन अवस्था के बाद मृत्यु हो जाती है।
गाय, भेंस काफी उतैजित दिखती है। तेज़ भागने की कोशिश करती है तथा जोर जोर से रम्माने लगती है और जमाइयाँ लेती है। सर को पेड़ या दीवार से टकराती है। मद के लक्षण दिखाई देते हैं। दुर्बल होने के कारण पशु अंत में मर जाता है।
बचाव:
जैसे ही पशु को बीमार पशु काट लें तो इससे बीमारी से बचाव के टीके लगवाने चाहिए। क्योंकि लक्षण पैदा होने के बाद सब व्यर्थ हैं। पालतू कुत्तों को नियमित रूप से टीके लगवाने चाहिए। तथा आवारा कुत्तों से बचाव।
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