मांसभक्षी व जंगली मछली का उन्मूलन
स्थाई जलक्षेत्र में मांसभक्षी व जंगली मछलियों का उन्मूलन
नितांत आवश्यक है I ये निम्न प्रकार से हमारी मछली की खेती को प्रभावित करती है
:-
- पालने वाली मछलियों को खा जाती है I
- जलक्षेत्र में विद्यमान प्राकृतिक आहार के साथ-साथ परिपूरक आहार को भी ग्रहण
करती है I
- इसका शारीरिक भार बढता नहीं है तथा सामान्यता ये छोटे आकार की रहती
है I
- जलक्षेत्र में विद्यमान घुली आँक्सीजन की मात्रा में कमी आती है
I
महुए की खली का प्रयोग
मांसभक्षी व जंगली मछलियों के उन्मूलन हेतु सबसे सुविधाजनक व उपयोगी उपाय
महुए की खली के प्रयोग का है I इसकी मात्रा 2500 कि०ग्राम० प्रति हैक्टेयर की दर
से प्रयोग की जाती है I अपने जलक्षेत्र का सम्पूर्ण क्षेत्रफल निकाल लें तथा 100 वर्ग
मीटर जलक्षेत्र हेतु 25 कि०ग्रा० महुए की खल का प्रयोग करें I एक बीघा जलक्षेत्र के
लिए यह मात्रा 200 कि०ग्रा० होनी चाहिए I खली को जल में घोल दिया जाता है तथा
24 घंटे में यह जहर का प्रभाव पैदा करके जलक्षेत्र में विद्यमान सम्पूर्ण जीवों को मार
देती है | बार –बार जाल चला कर मरी हुई सम्पूर्ण मछली को निकाल लिया जाता है
तथा इसका विक्रय किया जा सकता है I उपरोक्त विधि से मारी गई मछली मानव
उपयोग हेतू उपयुक्त है तथा इसको पका कर खाया जा सकता है I क्योंकि महुए की
खली जहर का प्रभाव करती है तथा इस जहर का प्रभाव जल में 15 से 18 दिन तक
रहता है I अत: इस अवधि में ग्रामीण पशुओं का जलक्षेत्र में प्रवेश नहीं होना चाहिए
तथा न ही यह जल पशुओं के पानी हेतू प्रयोग किया जाना चाहिए I
प्रयोग के 15 दिन पश्चात महुए की खली जल में खाद का कार्य करती
है तथा संग्रहण की जाने वाली मछली हेतू प्राकृतिक आहार पैदा करती है I यह आहार
पलैक्टोंन नामक सूक्ष्मदर्शी जीवों के रूप में होता है I अत: बाद में प्रयोग की जाने
वाली गोबर की खाद की मात्रा की आवश्यकता कम होती है I
ब्लिचिंग पाउडर का प्रयोग
मांसभक्षी व जंगली मछ्लियों के उन्मूलन हेतू 300 कि०ग्रा०
प्रति हैक्टेयर या 25 कि०ग्रा० प्रति बीघा या 100 वर्ग मीटर जलक्षेत्र हेतू 3 कि०ग्रा०
ब्लीचिंग पाउडर का प्रयोग करना चाहिए I इस विधि द्वारा मृत मछली का भी उपयोग
आहार के रूप में किया जा सकता है I
चूने का प्रयोग
जिस जलक्षेत्र में मत्स्य पालन किया जा रहा है , वह या तो अमलीय
(तेजाबी) होगा अन्यथा क्षारीय होगा I जल की जाँच पी.एच. पेपर से की जा सकती है
I साधारणतया पी.एच. 7.5 पर जल उदासीन होता है तथा इसमें नीचे के क्रम में जल
अम्लीय होता जाता है I अम्लीय जल में मत्स्य उत्पादन कम होता है I जल के
तेजाबीपन (अम्लीयता) को दूर करने हेतू निम्नानुसार चूने का प्रयोग करें:-
| जल/मिट्टी का पी. एच |
चूने की मात्रा |
| 4.0-4.5 |
1000 कि०ग्राम०/है० |
| 4.5-5.5 |
700 कि०ग्राम०/है० |
| 5.5-6.5 |
500 कि०ग्राम०/है० |
| 6.5-7.5 |
200 कि०ग्राम०/है० |
.
यदि पी .एच. 8.0 भी है तब भी जलक्षेत्र में चूने का प्रयोग अति
आवश्यक है I
जल का पी.एच. ज्ञात करने की विधि:-
बाजार में पी.एच. पेपर की डिब्बी (पैकेट) मिल जाती है I इस पैकेट
में प्राय: 6 प्रकार के विभिन्न रंगों को दर्शाता चिन्हित स्ट्रैप साथ में होता है यथा :-
पी. एच. 1 2 5 7 9
11
पी. एच. पेपर के रोल में 3”-4” का टुकड़ा काट कर तालाब के जल में डुबो
दिया जाता है I ऐसा करने पर यह कागज़ अपना रंग परिवर्तित कर लेता है I इस
परिवर्तित रंग को स्ट्रैप में दर्शाए रंग के साथ मिलान करके ज्ञात किया जाता है कि
पानी का पी. एच. कितना है I
यदि आपके पास पी.एच. पेपर की सुविधा नहीं है तो आप बाजार से खाने वाला पान ले
आएं I पान मुंह में चबा करा तालाब के जल में थूक दें I यदि थूक का रंग लाल
बना रहता है तो तालाब का पानी अम्लीय नहीं है I यदि थूक का रंग परिवर्तित हो कर
नीला हो जाता है तो तालाब का पानी अम्लीय (तेजाबी) है I
खाद का प्रयोग :-
जलीय क्षेत्र की उत्पादकता बढाने हेतु निम्नानुसार खादों का प्रयोग किया
जाना चाहिए:-
| खाद का नाम |
प्रति हैक्टेयर दी जाने वाली मात्रा |
| 1. ताजा गोबर |
10,000 से 15,000 कि०ग्राम० अथवा एक
बीघा हेतू 1000 कि०ग्राम० |
| 2. गली सड़ी खाद (कम्पोस्ट) |
10,000 से 12,000 कि०ग्रा० अथवा एक
बीघा हेतु 900 कि०ग्राम० |
| 3. बायो गैस सलरी |
20,000 से 30,000 कि०ग्राम० अथवा
2000 कि०ग्राम० प्रति बीघा |
| 4. पोल्ट्री मैन्योर (मुर्गियों की
बीठ) |
3000 से 4000 कि०ग्राम० अथवा 300
कि०ग्राम० प्रति बीघा |
| 5. पिग मैन्योर (सूअर का मल त्याग) |
2000 से 3000 कि०ग्राम० अथवा 250
कि०ग्राम० प्रति बीघा |
रासायनिक खादें:-
खाद का नाम
|
प्रति हैक्टेयर दी जाने वाली मात्रा |
| 1. यूरिया |
75 से 100 कि०ग्राम० प्रति हैक्टेयर वार्षिक
अथवा 6 से 8 कि०ग्राम० प्रति बीघा प्रतिवर्ष |
| 2. अमोनिया सल्फेट |
75 से 100 कि०ग्राम० प्रति हैक्टेयर वार्षिक
अथवा 6 से 8 कि०ग्राम० प्रति बीघा प्रतिवर्ष |
| 3. सुपर फास्फेट |
100 से 200 कि०ग्राम० प्रति हैक्टेयर वार्षिक
अथवा 8 से 15 कि०ग्राम० प्रति बीघा प्रतिवर्ष |
उपरोक्त दर्शाई गई सारणी में से 5000 से
10,000 कि०ग्राम० जैविक खाद प्रति हैक्टेयर की दर से आरम्भ में प्रयोग कर ली जाती
है तथा बाद में 1000 से 2000 कि०ग्राम० मासिक दर से किस्तों में प्रयोग की जाती है
Iखाद के प्रयोग से तालाब में विधमान पानी का रंग बदल जाएगा तथा इसकी
पारदर्शिता कम हो जाएगी I ऐसा पलैंकटॉन नामक सूक्ष्मदर्शी जीवों की संरचना के
कारण होगा जो कि तालाब में संग्रहित की जाने वाली मछली बीज का आहार है I यह
ज्ञात करने के लिए कि तालाब में पर्याप्त मात्रा पलैंकटॉन तैयार हो गए है – अपना
दायाँ बाजू कोहनी तक तालाब के जल में डूबो दें I उसके पश्चात हथेली पानी के बीच
में 90 डिग्री के कोण पर घुमा दें I यदि हथेली साफ दिखाई दे रही है तो पलैंकटॉन
कम मात्रा में उत्पन्न हुआ है| यदि हथेली धुंधलापन लिए नजर आती है तो पलैंकटॉनम
पर्याप्त मात्रा में तैयार है तथा मत्स्य बीज तालाब में डाला जा सकता है
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