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मत्स्य पालन व्यवसाय में स्व:रोजगार



हिमाचल प्रदेश की वर्तमान जनसंख्या 63 लाख के लगभग है तथा रोजगार कार्यालयों में दर्ज बेरोजगारों की संख्या 8 लाख से अधिक हो गई है I


सरकारी व् निजी क्षेत्र में रोजगार के अवसर सीमित हो गए हैं तथा बेरोजगारी दिन प्रतिदिन बढती ही जा रही है I ऐसी अवस्था में यह नितांत आवशयक है कि अपना स्वंय का कोई व्यवसाय प्रारंभ किया जाए ताकि जीविका अर्जित की जा सके I


उपरोक्त परिस्थिति को मद्देनजर रखते हुए मत्स्य पालन एवं इससे जुडे अन्य व्यवसाय तथा मत्स्य पालन विभाग द्वारा चलाई जा रही योजनाओं एवं विभाग व् मत्स्य किसान विकास अभिकरण द्वारा उपलब्ध कराई जाने वाली वित्तीय सहायता बारे साधारण भाषा में जानकारी देने का प्रयत्न किया गया है ताकि कम पढ़ा लिखा व्यक्ति भी जानकारी प्राप्त करके लाभान्वित हो सके I मत्स्य पालन हेतू जल क्षेत्र की आवश्यकता होती है I यह जलक्षेत्र हमें दो प्रकार से उपलब्ध हो सकता है:-


  1. प्राकृतिक जल क्षेत्र


  2. स्व:निर्मित जल क्षेत्र


प्राकृतिक जल क्षेत्र में मत्स्य पालन


प्राकृतिक जल क्षेत्र में तालाब (पोखर) तथा चैक डैम व रेलवे लाईन के किनारों पर पर्याप्त मात्रा में रूका जल क्षेत्र आता है I उपरोक्त में से कुछ जल क्षेत्र 12 मासी होते हैं तथा कुछ जल क्षेत्र मौसमी होते हैं


मौसमी जल क्षेत्र में मत्स्य पालन

इस श्रेणी में वे जल क्षेत्र आते हैं जिनमें वर्षा ऋतु के पश्चात पर्याप्त जल भंडारण हो जाता है परन्तु भीषण गर्मी में ये सूख जाते हैं I अत: इनमें हमें 9-10 महीने मत्स्य पालन करने का अवसर प्राप्त होता है I वर्षा ऋतु में मत्स्य बीज संग्रहण किया जाता है तथा गर्मी आने पर सम्पूर्ण फसल निकाल ली जाती है I यदि साथ में बारहमाशी जल क्षेत्र उपलब्ध हो तो बड़े आकार की मछली का विक्रय करके छोटे आकार की मछली को 12 माशी जल क्षेत्र में स्थानांतरित कर लिया जाता है अन्यथा सम्पूर्ण फसल क विक्रय कर दिया जाता है I



बारह मासी जल क्षेत्र में मत्स्य पालन


  1. जलीय पौधों व वनस्पति का उन्मूलन


  2. मांसभक्षी व जंगली मछलीयों का उन्मूलन


  3. तालाब में चूने व खाद का प्रयोग


  4. मत्स्य बीज संग्रहण


जलीय पौधों व वनस्पति का उन्मूलन :-


साधारणतया 12 माशी जलक्षेत्र में चार प्रकार के जलीय घास व पौधे पाए जाते हैं I

  1. जल की ऊपरी सतह पर तैरने वाले पौधे व वनस्पति I


  2. जलक्षेत्र के तले से उगने वाली घास जो कि जल के बीच ही डूबे रहते हैं I


  3. जल क्षेत्र के तले से उगकर पानी की ऊपरी सतह से बाहर आ जाने वाले घास या पौधे I


  4. जलक्षेत्र के किनारों पर उगने वाले घास I



जलक्षेत्र में विधमान प्रत्येक प्रकार की वनस्पति निम्न प्रकार से मत्स्य पालन पर प्रतिकूल प्रभाव डालती है:-


  1. पाली जाने वाली मछलियों की गतिविधि में बाधा उत्पन्न करती है I


  2. जल क्षेत्र में विधमान प्राकृतिक आहार को असंतुलित करती है तथा अधिकतर खाद का प्रयोग स्वयं के लिए कर लेती है I


  3. जल में घुली आंक्सीजन गैस की मात्र में कमी कर देती है I


  4. मछली पकड़ने के लिए जाल चलाने में बाधा उत्पन्न होती है I


अत: चारों प्रकार के जलीय पौधों का उन्मूलन अति आवश्यक है I यदि जलकुंभी घास (वाटर ह्यासिंथ) की समस्या न हो तो अन्य सभी प्रकार की वनस्पतियों का उन्मूलन मानवी मजदूरी द्वारा किया जा सकता है I इसके लिए बारबड वायर अर्थात कांटेदार तार लेकर उसमें थोड़े-थोड़े फासले पर भार लटका कर जलमग्न पौधों का उन्मूलन तार को जल क्षेत्र में से घुमा कर (पानी के बीच में से खींच कर ) किया जा सकता है I इसी प्रकार कांटेदार तार के साथ पतली टाट (प्याज के कट्टों वाली) बांध कर दो व्यक्तियों द्वारा तार तालाब के किनारों से ऊपरी सतह पर खींच कर सतह पर तैरने वाले घासों का उन्मूलन किया जा सकता है I


जल में विद्यमान जलीय पौधों का उन्मूलन ग्रास कार्प नामक मछली के संग्रहण द्वारा भी किया जाता है I ग्रास कार्प मछली की यह विशेषता है कि यह अपने शारीरिक भार से भी अधिक आहार एक दिन में ग्रहण कर लेती है I साधारणतया यह तालाब में विधमान नर्म घास या जलीय पौधे को आहार के रूप में लेती है तथा अध्पची अवस्था में मल के रूप में विसर्जित कर देती है I इस विसर्जन को कांमन कार्प नामक मछली अपने आहार के रूप में ग्रहण करती है I केवल मात्र जलकुंभी नामक घास के उन्मूलन हेतू रसायन की आवश्यकता पड़ती है परन्तु सौभाग्य से हिमाचल प्रदेश में इसकी समस्या लगभग शून्य है I





मांसभक्षी व जंगली मछली का उन्मूलन


स्थाई जलक्षेत्र में मांसभक्षी व जंगली मछलियों का उन्मूलन नितांत आवश्यक है I ये निम्न प्रकार से हमारी मछली की खेती को प्रभावित करती है :-


  1. पालने वाली मछलियों को खा जाती है I

  2. जलक्षेत्र में विद्यमान प्राकृतिक आहार के साथ-साथ परिपूरक आहार को भी ग्रहण करती है I


  3. इसका शारीरिक भार बढता नहीं है तथा सामान्यता ये छोटे आकार की रहती है I


  4. जलक्षेत्र में विद्यमान घुली आँक्सीजन की मात्रा में कमी आती है I



महुए की खली का प्रयोग

मांसभक्षी व जंगली मछलियों के उन्मूलन हेतु सबसे सुविधाजनक व उपयोगी उपाय महुए की खली के प्रयोग का है I इसकी मात्रा 2500 कि०ग्राम० प्रति हैक्टेयर की दर से प्रयोग की जाती है I अपने जलक्षेत्र का सम्पूर्ण क्षेत्रफल निकाल लें तथा 100 वर्ग मीटर जलक्षेत्र हेतु 25 कि०ग्रा० महुए की खल का प्रयोग करें I एक बीघा जलक्षेत्र के लिए यह मात्रा 200 कि०ग्रा० होनी चाहिए I खली को जल में घोल दिया जाता है तथा 24 घंटे में यह जहर का प्रभाव पैदा करके जलक्षेत्र में विद्यमान सम्पूर्ण जीवों को मार देती है | बार –बार जाल चला कर मरी हुई सम्पूर्ण मछली को निकाल लिया जाता है तथा इसका विक्रय किया जा सकता है I उपरोक्त विधि से मारी गई मछली मानव उपयोग हेतू उपयुक्त है तथा इसको पका कर खाया जा सकता है I क्योंकि महुए की खली जहर का प्रभाव करती है तथा इस जहर का प्रभाव जल में 15 से 18 दिन तक रहता है I अत: इस अवधि में ग्रामीण पशुओं का जलक्षेत्र में प्रवेश नहीं होना चाहिए तथा न ही यह जल पशुओं के पानी हेतू प्रयोग किया जाना चाहिए I


प्रयोग के 15 दिन पश्चात महुए की खली जल में खाद का कार्य करती है तथा संग्रहण की जाने वाली मछली हेतू प्राकृतिक आहार पैदा करती है I यह आहार पलैक्टोंन नामक सूक्ष्मदर्शी जीवों के रूप में होता है I अत: बाद में प्रयोग की जाने वाली गोबर की खाद की मात्रा की आवश्यकता कम होती है I



ब्लिचिंग पाउडर का प्रयोग

मांसभक्षी व जंगली मछ्लियों के उन्मूलन हेतू 300 कि०ग्रा० प्रति हैक्टेयर या 25 कि०ग्रा० प्रति बीघा या 100 वर्ग मीटर जलक्षेत्र हेतू 3 कि०ग्रा० ब्लीचिंग पाउडर का प्रयोग करना चाहिए I इस विधि द्वारा मृत मछली का भी उपयोग आहार के रूप में किया जा सकता है I



चूने का प्रयोग


जिस जलक्षेत्र में मत्स्य पालन किया जा रहा है , वह या तो अमलीय (तेजाबी) होगा अन्यथा क्षारीय होगा I जल की जाँच पी.एच. पेपर से की जा सकती है I साधारणतया पी.एच. 7.5 पर जल उदासीन होता है तथा इसमें नीचे के क्रम में जल अम्लीय होता जाता है I अम्लीय जल में मत्स्य उत्पादन कम होता है I जल के तेजाबीपन (अम्लीयता) को दूर करने हेतू निम्नानुसार चूने का प्रयोग करें:-



जल/मिट्टी का पी. एच चूने की मात्रा
4.0-4.5 1000 कि०ग्राम०/है०
4.5-5.5 700 कि०ग्राम०/है०
5.5-6.5 500 कि०ग्राम०/है०
6.5-7.5 200 कि०ग्राम०/है०
.
यदि पी .एच. 8.0 भी है तब भी जलक्षेत्र में चूने का प्रयोग अति आवश्यक है I


जल का पी.एच. ज्ञात करने की विधि:-


बाजार में पी.एच. पेपर की डिब्बी (पैकेट) मिल जाती है I इस पैकेट में प्राय: 6 प्रकार के विभिन्न रंगों को दर्शाता चिन्हित स्ट्रैप साथ में होता है यथा :-

पी. एच. 1 2 5 7 9 11


पी. एच. पेपर के रोल में 3”-4” का टुकड़ा काट कर तालाब के जल में डुबो दिया जाता है I ऐसा करने पर यह कागज़ अपना रंग परिवर्तित कर लेता है I इस परिवर्तित रंग को स्ट्रैप में दर्शाए रंग के साथ मिलान करके ज्ञात किया जाता है कि पानी का पी. एच. कितना है I यदि आपके पास पी.एच. पेपर की सुविधा नहीं है तो आप बाजार से खाने वाला पान ले आएं I पान मुंह में चबा करा तालाब के जल में थूक दें I यदि थूक का रंग लाल बना रहता है तो तालाब का पानी अम्लीय नहीं है I यदि थूक का रंग परिवर्तित हो कर नीला हो जाता है तो तालाब का पानी अम्लीय (तेजाबी) है I


खाद का प्रयोग :-



जलीय क्षेत्र की उत्पादकता बढाने हेतु निम्नानुसार खादों का प्रयोग किया जाना चाहिए:-


खाद का नाम प्रति हैक्टेयर दी जाने वाली मात्रा
1. ताजा गोबर 10,000 से 15,000 कि०ग्राम० अथवा एक बीघा हेतू 1000 कि०ग्राम०
2. गली सड़ी खाद (कम्पोस्ट) 10,000 से 12,000 कि०ग्रा० अथवा एक बीघा हेतु 900 कि०ग्राम०
3. बायो गैस सलरी 20,000 से 30,000 कि०ग्राम० अथवा 2000 कि०ग्राम० प्रति बीघा
4. पोल्ट्री मैन्योर (मुर्गियों की बीठ) 3000 से 4000 कि०ग्राम० अथवा 300 कि०ग्राम० प्रति बीघा
5. पिग मैन्योर (सूअर का मल त्याग) 2000 से 3000 कि०ग्राम० अथवा 250 कि०ग्राम० प्रति बीघा


रासायनिक खादें:-


खाद का नाम
प्रति हैक्टेयर दी जाने वाली मात्रा
1. यूरिया 75 से 100 कि०ग्राम० प्रति हैक्टेयर वार्षिक अथवा 6 से 8 कि०ग्राम० प्रति बीघा प्रतिवर्ष
2. अमोनिया सल्फेट 75 से 100 कि०ग्राम० प्रति हैक्टेयर वार्षिक अथवा 6 से 8 कि०ग्राम० प्रति बीघा प्रतिवर्ष
3. सुपर फास्फेट 100 से 200 कि०ग्राम० प्रति हैक्टेयर वार्षिक अथवा 8 से 15 कि०ग्राम० प्रति बीघा प्रतिवर्ष


उपरोक्त दर्शाई गई सारणी में से 5000 से 10,000 कि०ग्राम० जैविक खाद प्रति हैक्टेयर की दर से आरम्भ में प्रयोग कर ली जाती है तथा बाद में 1000 से 2000 कि०ग्राम० मासिक दर से किस्तों में प्रयोग की जाती है Iखाद के प्रयोग से तालाब में विधमान पानी का रंग बदल जाएगा तथा इसकी पारदर्शिता कम हो जाएगी I ऐसा पलैंकटॉन नामक सूक्ष्मदर्शी जीवों की संरचना के कारण होगा जो कि तालाब में संग्रहित की जाने वाली मछली बीज का आहार है I यह ज्ञात करने के लिए कि तालाब में पर्याप्त मात्रा पलैंकटॉन तैयार हो गए है – अपना दायाँ बाजू कोहनी तक तालाब के जल में डूबो दें I उसके पश्चात हथेली पानी के बीच में 90 डिग्री के कोण पर घुमा दें I यदि हथेली साफ दिखाई दे रही है तो पलैंकटॉन कम मात्रा में उत्पन्न हुआ है| यदि हथेली धुंधलापन लिए नजर आती है तो पलैंकटॉनम पर्याप्त मात्रा में तैयार है तथा मत्स्य बीज तालाब में डाला जा सकता है I





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