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हिमाचल प्रदेश के पहाड़ी क्षेत्रों में मत्स्य पालन



हिमाचल प्रदेश में मत्स्य पालन


मछली जैव प्रोटीन का एक मुख्य स्त्रोत है इसलिए यह जन साधारण के स्वास्थ्य की आवश्यकताओं के लिए मुख्य भूमिका निभा सकता है क्योंकि बढती हुई जनसंख्या के कारण स्वास्थ्यप्रद भोजन की कमी आ रही है | अत: मत्स्य पालन उपरोक्त कमी को पर्याप्त सीमा तक पूर्ण करने में सहयोग देकर उचित भूमिका निभा रहा है |


हिमाचल प्रदेश का निचला पहाड़ी क्षेत्र शिवालिक पर्वतमाला और दून घाटी तक 300 मी० से 5000 मी० की उंची पहाड़ियों पर आधारित पर्वतीय प्रदेश है और इन पर्वतमालाओं से कई मुख्य नदियों जैसे चिनाब, रावी, व्यास और सतलुज आदि का उदय हुआ है और इन नदियों में पाया जाने वाला मत्स्यधन महाशीर, गिड, साईजोंथौरेक्स आदि आर्थिक रूप से प्रमुख है लेकिन इन नदियों से प्राप्त होने वाला मत्स्य धन मांग को पूर्ण करने में सक्षम नहीं है |


मछली की बढती मांग को ध्यान में रखते हुए मत्स्य पालन के विस्तार की विभिन्न तकनीकों को अपनाने के लिए प्रदेश में मत्स्य कृषक विकास अभिकरणों की स्थापना की गई जिससे ग्रामीण क्षेत्रों में पुराने तालाबों का अनुरक्षण, नए तालाबों का निर्माण तथा बह्ते पानी में मत्स्य पालन करने की विधियों का प्रचार व प्रसार करके मत्स्य उत्पादन को बढावा देने के लिए उचित कदम उठाए गए हैं |


मत्स्य पालन के लिए तालाब निर्माण :


मछली पालन के तालाब निर्माण के लिए निम्न बातों का ध्यान रखना आवश्यक है:-

  1. ऐसा तालाब जिसमें साल भर पानी रह सके |
  2. मिट्टी में उर्वरकता हो |
  3. मिट्टी अम्लीय और क्षरीय न हो |

तालाब निर्माण के लिए स्थान का चयन:-


मछली पालन के लिए तालाब निर्माण हेतू स्थान का चयन करते समय निम्न बातों का ध्यान रखना आवश्यक है :-

  1. स्थान प्राकृतिक रूप से गहरा हो |
  2. जिसकी जलधारण क्षमता अधिक हो |
  3. जिसमें दी जाने वाली खाद व उर्वरकों का शोषण ना हो |
  4. मिट्टी न तो अधिक अम्लीय हो और न क्षरीय (पी० एच० 6 से 8 के बीच हों)
  5. जहां हर मौसम में पहुँचने का मार्ग उपलब्ध हो |
  6. जिसके पास कोई सदाबहार जलस्त्रोत हो |
  7. जिसकी मिट्टी बाँध बनाने में उपयुक्त हो |

इस चयन में मुख्य भूमिका चयन किए गए स्थल की मिट्टी की होती है | मिट्टी तीन प्रकार की होती है – बालुई, लोमी और चिकनी मिट्टी | इन तीनों प्रकारों की मिट्टी की बनावट निम्न है :-


साधारण नाम बनावट बनावट के आधार पर नाम
बालुई मोटी बालुई, बालुई लोम
  मध्यम मोटी  बालुई, लोम, महीन बालुई लोम 
लोमी मध्यम बहुत महीन बालुई लोम
  बहुत महीन लोम, सिल्ट लोम, सिल्ट
चिकनी मिट्ठी महीन बालुई चिकनी मिट्ठी, सिल्ट चिकनी, चिकनी क्ले लोम


मिट्टी की संरचना ज्ञात करना :


अगर मिट्टी की संरचना ज्ञात हो तो आसानी से बताया जा सकता है कि वह क्या है और उसमें तालाब बनाने की उपयुक्तता पर विचार किया जा सकता है, इसके लिए मिट्टी को प्रयोगशाला में भेजा जा सकता है या आप स्वयं इसकी जांच कर सकते हैं | इसके लिए नमूने की मिट्टी को दो मिली मीटर वाली जाली से छान कर बड़े टुकड़ों को अलग कर दिया जाता है तथा बारीक भाग, की निम्न विधि से जांच की जा सकती है :


विधि न० 1:

इस विधि में एक मुट्ठी लेकर उसका गोला बना लें इस गोले को लगभग 1.5 फुट तक हाथ में उछाले | अगर गोला टूट जाता है तो समझना चाहिए कि मिट्टी अच्छी नहीं है | इसमें काफी मात्रा में बालू है | यदि गोला नहीं टूटता है तो इसमें समुचित मात्रा में चिकनी मिट्टी है |


विधि न० 2:

मुट्ठी नमूने की मिट्टी लेकर उसे दबाकर गोला बनाएँ यदि हाथ के आकार का गोला बन जायें तो समझे कि इसमें समुचित मात्रा में चिकनी मिट्टी है यदि ऐसा न हो तो समझना चाहिए कि इस मिट्टी में रेट की मात्रा अधिक है |


तालाब के लिए स्थान चयन में उसकी मिट्टी में निहित क्ले, सिल्ट और बालू की प्रतिशत मात्रा जानना आवश्यक है तभी उनके गुणों और तालाबों के लिए उपयोगिता को निर्धारित किया जा सकता है | इसको मालूम करने के लिए एक आसान तरीका भी है जिसे आप स्वयं कर सकते हैं :-


  1. एक बोतल में 10 से०मी० तक मिट्टी डाले और पानी से भर दें |

  2. बोतल को खूब हिलाकर इसे घंटे तक रहने दें बोतल में मिट्टी के कण विभिन्न सतहों पर बैठ जायेंगे |
    1. नीचे की सतह में बालू और पत्थर रहते हैं |
    2. बीच के तल में सिल्ट रहता है |
    3. और उपर वाले तल में क्ले रहती है |

  3. इन विभिन्न मिट्टीयों के तल को माप कर उनकी प्रतिशत मात्रा निकाली जा सकती है |



मिट्टी की पहचान :


इसकी पहचान प्रयोगशाला से भी कराई जा सकती है |

मुट्ठी भर मिट्टी को लेकर पानी से गूंथ लें ताकि वः आपस में चिपक जाये, इस प्रकार गुंथी हुई मिट्टी के कणों में पकड़ अधिक है तो वह क्ले है यदि पकड़ कम है तो वह सिल्ट है |


मिट्टी की पारगम्यता (रिसाव) की जांच:


तालाब के स्थान की मिट्टी की पारगम्यता जानना बहुत आवशयक है यदि पारगम्यता कम है तो उस स्थान पर बने तालाब में पानी का रिसाव कम होगा यदि पारगम्यता अधिक है तो शीघ्र ही तालाब में कम होना प्रारम्भ हो जायेगा | विभिन्न प्रकार की मिट्टी की औसत पारगम्यता भिन्न होती है :-



क्रम संख्या मिट्टी मात्रा
1 बालुई मिट्टी (रेतली)  5.0 सै०मी०/ घंटा
2 बालुई लोम 2.5 सै०मी०/ घंटा
3 लोम 1.3 सै०मी०/ घंटा
4 क्ले लोम 0.8 सै०मी०/ घंटा
5 सिल्ट क्ले 0.25 सै०मी०/ घंटा
6 क्ले 0.05 सै०मी०/ घंटा


इस पारगम्यता को जानने के लिए आप तालाब के लिए चयन किये गये स्थान पर एक गडा 1 मी0 X 1मी0 X 1मी0 के अनुपात में बना लें और उसको पूर्ण पानी से भर दें और दूसरी सुबह यदि गडे में ¾ भाग पानी रहता है तो यह स्थान तालाब बनाने के लिए उपयुक्त है | इस प्रक्रिया को आप दोहरा भी सकते हैं फिर अंतिम निर्णय लें |



तालाब के बाँध का निर्माण :


तालाब के बाँध का निर्माण काफी महत्वपूर्ण है, क्योंकि इसी पर तालाब का भविष्य निर्भर करता है | बाँध इतना मजबूत होना चाहिए कि वह तालाब के पानी का दबाब सहन कर सके और जिसमें पानी का रिसाव कम से कम हो | बांध निर्माण में निम्न बातों का ध्यान रखना आवशयक है :-


  1. बाँध निर्माण के समय पेड़-पौधों को जड़ सहित वहीं से हटा देना चाहिए क्योंकि इनके गलने सड़ने से पानी का रिसाव होने लगता है |

  2. तालाब के तल से हटाई गई मिट्टी यदि चिकनी है तो उससे बाँध नहीं बनाना चाहिए क्योंकि चिकनी मिट्टी के सूखने पर बाँध में दरारें पड़ जायेंगी और पानी का रिसाव शुरू हो जाएगा | अच्छा बाँध ऐसी मिट्टी से बन सकता है जिसमें 60-80 शत बालुई मिट्टी तथा 8-15 प्रतिशत चिकनी मिट्टी हो |

  3. बाँध निर्माण में बाँध की पूरी चौड़ाई में एक साथ कार्य होना चाहिए |

  4. बाँध की ढलान का कार्य भी साथ-साथ होना चाहिए|

  5. बाँध निर्माण के समय प्रति एक फुट ऊँचाई बनने के बाद उस पर पानी का छिडकाव करके दबाना चाहिए जिससे बाँध पर डाली गई मिट्टी के कण आपस में पकड़ कर लें|



बाँध की ढलान :-


बाँध की शक्ति केवल उसकी मिट्टी पर ही निर्भर नहीं करती बल्कि उसकी ढलान और शिखर की चौड़ाई पर भी निर्भर करती है |



विभिन्न वर्ग की मिट्टियों के लिए बाँध की ऊँचाई के लिए ढलान :


मिट्टी बाँध की ऊंचाई बाँध की ढलान शिखर की चौड़ाई
साधारण मिट्टी, नर्म चिकनी मिट्टी   2.5 मी० 1:1.5 मी० 2 मी०
हल्का भुरभुरी मिट्टी 2.5 मी० 1:2.0 मी० 2 मी०
हल्का बालुई, नर्म चिकनी मिट्टी 2.5 मी० 1:3.0 मी० 2 मी०


तालाब में मिट्टी के कटाव को रोकने के लिए तथा बाँध के साथ लगने वाली जमीन की बचत के लिए तालाब के अंदर की ओर बाँध की ढलान अधिक होनी चाहिए और बाँध के बाहर की ढलान कम होनी चाहिए |






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