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52 सप्ताह हेतु कृषि कार्यों की रुपरेखा

जनवरी फ़रवरी मार्च अप्रैल मई जून
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मार्च (10 से 14 सप्ताह)


  1. मौसम को ध्यान में रखते हुए गेहूं में क्रांतिक अवस्थाओं में सिंचाई करें निचले क्षेत्रों में पकने पर गेहूं व अन्य रबी फसलों की कटाई करें|

  2. गेहूं में रतुआ रोग के लक्षण प्रकट होते ही डाईथेन एम 45 (2 ग्रा.प्रति लीटर पानी) या टिल्ट (1 ग्रा. प्रति लीटर पानी) का छिड़काव करें| खुली कांगियारी (काली बालियों वाले पौधे) नामक रोग से ग्रस्त गेहूं के पौधों को बिमारी के लक्षण प्रकट होते ही निकाल कर जला दें|

  3. यदि सूरजमुखी की फसल कमजोर दिखाई पड़े तो फसल में अंकुरण के तीस दिन बाद 3.5 कि.ग्रा. यूरिया या 6.4 कि.ग्रा. कैन प्रति बीघा डालें| ऊँचे पर्वतीय क्षेत्रों में सूरजमुखी ( ई.सी. 68415) बीजाई मार्च अन्त में करें|

  4. माश (यूजी-218) की जैद फसल की सिंचित क्षेत्रों में बीजाई मार्च के पहले पखवाड़े में करें| मृग (पूसा बैसाखी) प्रदेश के उन गर्म क्षेत्रों में जहां सिंचाई की सुविधा उपलब्ध है, वहां गेहूं की कटाई के तुरन्त बाद बिजाई करें|

  5. निचले पर्वतीय एवं घाटी वाले क्षेत्रों में मार्च का पहला पखवाड़ा एवं मध्यवर्ती क्षेत्रों में मार्च का अन्तिम सप्ताह गन्ने की बिजाई के लिए उपयुक्त समय होता है| प्रति बीघा 4000 तीन आँखों वाली बीज की पोरियां लगाएं| अच्छा अंकुरण प्राप्त करने के लिए बीज की पोरियों को 100 ग्रा. एगालाल (3 प्रतिशत) 0.5 प्रतिशत या 50 ग्रा. एरिटान (6 प्रतिशत) या टेफासान (6 प्रतिशत) के 0.25 प्रतिशत घोल में बीजाई से पहले 20 लीटर पानी में एक बीघा क्षेत्र बिजाई के लिए उपचार करें| बिजाई के समय 13 कि.ग्रा. कैन, 375 कि.ग्रा. एस.एस.पी. व 13.4 कि.ग्रा. एम.ओ.पी. डालें| बीजाई के तुरन्त बाद टेफाजिन 50 डब्ल्यू पी. (160-200 ग्राम/बीघा) 60-64 लीटर पानी में छिड़काव करने से खरपतवारों का नियन्त्रण हो जाता है| 

  6. गन्ने की मूडी फसल लेने के लिए यदि कटाई फ़रवरी में न की हो तो इसी मास में करें| बीज वाली फसल की अपेक्षा मूडी फसल में नाइट्रोजन उर्वरकों की आवश्यकता डेढ़ गुणा अधिक होती है| इसे तीन बार डालना चाहिए| महीने के अन्त में फास्फोरस और पोटाश उर्वरकों को गन्ने की कतारों के साथ-साथ डालें| खाली स्थानों में पहले से अंकुरित शाखाओं को लगाएं|

  7. जिन क्षेत्रों में गन्ने की बीजाई की जाती है वहां दीमक व तना छेदक कीटों की रोकथाम के लिए 60 मि.ली. क्लोरपाईरिफास 20 ई.सी. को 2 कि.ग्रा. रेत में मिलाकर परतों बीघा की दर से खेत में मिलाएं|

  8. सरसों वर्ग की फसलों में तेले का प्रकोप होने पर पहले दिये कीट नाशकों का प्रयोग करें|

  9. चने में भी तापमान के बढ़ने के साथ-साथ फली छेदक सुंडी का प्रकोप गम्भीर हो सकता है जिसका विशेष ध्यान रखें| 

  10. चना व मसर की फसलों में झुलसा रोग के लक्षण आते ही डाईथेन एम 45 (2.5 ग्रा.प्रति लीटर पानी) का 15 दिन के अन्तराल पर छिड़काव करें|

सब्जियां

निचले पर्वतीय क्षेत्र

  1. इस महीने के प्रथम पखवाड़े तक प्रदेश के निचले पर्वतीय क्षेत्रों में फ्रांसबीन की झाड़ीदार किस्मों (कन्टेडर, प्रीमीयर, अर्का कोमल, पूसा पार्वती, वी.एल.बौनी-1) की बीजाई कतारों में 30-45 सैं.मी. तथा पौधों 10-15 सैं.मी दूरी पर की जा सकती है| एक बीघे में बीजाई के लिए लगभग 60 कि.ग्रा. बीज का प्रयोग करें|



  2. इसी महीने भिण्डी की सुधरी किस्मों पी. 8, अर्का अनामिका, परबनी क्रान्ति, वर्षा उपहार तथा संकर किस्मों की बीजाई पंक्तियों में 30-45 सैं.मी. तथा पौधों में 7-10 सैं.मी की दूरी पर करें| बीजाई के 10-15 कि.ग्रा. बीज प्रति बीघा ही प्रयोग करें भिण्डी से अन्य बीज अंकुरण के लिए बीजों को लगभग 24 घन्टे तक पानी में भिगोने के उपरान्त ही बीजाई करें|

  3. भिण्डी व फ़्रांसबीन की बीजाई करने से पहले बीज का उपचार बैवस्टीन 50 डब्ल्यू.पी. (2 ग्रा. प्रति कि.ग्रा. बीज) से अवश्य करें|

  4. भिण्डी एवं फ्रांसबीन में खरपतवार नियन्त्रण के लिए लासो (एलाक्लोर) 320 मि.ली. या स्टाम्प (पैणिडमिथेलिन) 320 मि.ली. प्रति बीघा की दर से 60 लीटर पानी में घोलकर बीजाई के तुरन्त बाद छिड़काव करें|

  5. इसी समय पालक की सुधरी किस्म बैनर्जी जाँयट की बीजाई पंक्तियों में 25-30 सैं.मी. की दूरी पर प्रति बीघा 2.0 कि.ग्रा. बीज का प्रयोग करके की जा सकती है|

  6. इस महीने बैंगन, शिमला मिर्च तथा लाल मिर्च की पनीरी भी उगाई जा सकती है| इन सब्जियों की सवस्थ पौध उत्पादन हेतु सुधरी, रोग प्रतिरोधी तथा अधिक पैदावार होने वाली किस्मों का चयन करें|

  7. पोलीथीन के लिफाफों में तैयार कद्दू वर्गीय सब्जियों के पौधों को खेतों में उचित दूरी पर छोटे-छोटे गढ़्ढ़े बनाकर लिफाफों को काटकर रोपित किया जा सकता है| खेत तैयार करते समय 20 क्विंटल गोबर की गली-सड़ी खाद तथा रोपाई के समय 16 कि.ग्रा. कैन 25 कि.ग्रा. सिंगल सुपर फास्फेट तथा 8 कि.ग्रा. म्यूरेट ऑफ पोटाश प्रति बीघा खादों का मिश्रण खेतों में मिलाएं| इसके अतिरिक्त इन्ही सब्जियों की सीधी बीजाई समतल खेतों, नालियों या थाले बनाकर भी इसी महीने की जा सकती है| अच्छा एवं जल्दी बीज अंकुरण के लिए इन सब्जियों के बीजों की बीजाई से पहले 24 घण्टे तक पानी में भिगो लें| 

  8. सिंचित क्षेत्रों में तथा कचालू की जल्दी तैयार होने वाली फसल की बीजाई भी की जा सकती है| बीजाई के लिए रोग रहित 50-60 ग्राम वजन वाले कन्द, जिनमें कम से कम 2 आंखें हो, का ही प्रयोग करें| बीजाई से पहले कन्दों का उपचार इण्डोफिल एम 45 (25 ग्राम) तथा बैविस्टीन (10 ग्रा.) प्रति 10 लीटर पानी के घोल में आधे घण्टे तक करें| उपचारित कन्दों को छाया में सुखाने के उपरान्त 45 सैं.मी. कतारों तथा 30 सैं.मी कन्दों से कन्दों की दूरी पर बीजाई करें| खेत तैयार करते समय 20 क्विंटल गोबर की गली-सड़ी खाद तथा बीजाई के समय 15 कि.ग्रा. कैन, 30 कि.ग्रा. सिंगल सुपर फास्फेट तथा 4 कि.ग्रा. म्यूरेट ऑफ पोटाश प्रति बीघा खादों का मिश्रण खेतों में डालें| बीजाई के तुरन्त बाद बाद, हरी पत्तियां (10 क्विंटल) या सूखी पत्तियां (8 क्विंटल) या गोबर की गली-सड़ी खाद (8 क्विंटल) प्रति बीघा का मल्च खेतों के ऊपर डालें| 

  9. टमाटर बैंगन व शिमला मिर्च आदि सब्जियों की रोपाई करने के लिए खेत तैयार करते समय गोबर की कच्ची खाद न डालें तथा जिन क्षेत्रों में कटुआ कीट (टोका) व सफेद सुण्डी आदि का अधिक प्रकोप होता हो वहां खेत तैयार करते समय 2 कि.ग्रा. रेत में 160 मि.ली. क्लोरपाईरिफास 20 ई.सी. मिलाकर रेत व दवाई के मिश्रण को एक बीघा खेत की मिट्टी में मिला दें|

  10. आलू में आलू का पतंगा (पी.टी.एम) नामक कीट का खेत में प्रकोप होने पर 36 मि.ली. साईपरमैथ्रिन 25 ई.सी. या 52 मि.ली. डेकामैथ्रिन 2.8 ई.सी.+ 90 मि.ली. बी.टी. (डाईपल 8 एल) 150 म.ली. क्लोरपाईरिफास 20 ई.सी. को 60 लीटर पानी में घोल बनाकर प्रति बीघा मार्च के तीसरे सप्ताह छिड़काव करें| आलू का पिछेता झूलसा रोग के प्रति सावधान रहे तथा रोग के आते ही रिडोमिल एम.ज़ैड 70 डब्ल्यू.पी. (1.5 ग्रा. प्रति लीटर पानी) का 15 दिन के अन्तराल पर दो बार छिड़काव करें| उसके बाद 7 दिन के अंतर पर डाईथेन एम. 45 (2 ग्रा. प्रति लीटर पानी) के चार छिड़काव करें|

  11. प्याज में डाऊनी मिल्डयु रोग के प्रकट होते ही रिडोमिल एम ज़ैड (25 ग्रा. प्रति लीटर 10 लीटर पानी) का छिड़काव करें|

  12. इसी समय टमाटर, बैंगन, शिमला मिर्च तथा लाल मिर्च की तैयार पौधे की खेतों में रोपाई करें| टमाटर की साधारण किस्मों, बैंगन तथा शिमला मिर्च की रोपाई 60 सैं.मी. पंक्तियों की दूरी पर तथा 45 सैं.मी. पौधों से पौधों की दूरी पर की जा सकती है| टमाटर की संकर किस्मों की रोपाई 90 सैं.मी. कतारों तथा 30 सैं.मी. पौधों से पौधों की दूरी पर करें| खेत तैयार करते समय 20 क्विंटल गोबर की गली-सड़ी खाद तथा रोपाई के समय 16 कि.ग्रा. कैन, 14 कि.ग्रा. सिंगल सुपर फास्फेट तथा 7 कि.ग्रा. म्यूरेट आफ पोटाश परतों बीघा टमाटर (साधारण किस्मों), बैंगन, शिमला मिर्च तथा लाल मिर्च में डालें| टमाटर की संकर किस्मों के लिए 24 कि.ग्रा. कैन, 60 कि.ग्रा. सिंगल सुपर फास्फेट तथा 7 कि.ग्रा. म्यूरेट ऑफ पोटाश प्रति बीघा खेतों में डालें| शेष कौन सी आधी मात्रा (14-16 कि.ग्रा.) दो बराबर भागों में, एक निराई-गुड़ाई के समय तथा दूसरी फूल आने पर फसल में डालें|

मध्य पर्वतीय क्षेत्र:

  1. इन क्षेत्रों में ग्रीष्म कालीन सब्जियों (टमाटर, बैंगन, शिमला मिर्च व लाल मिर्च) की पनीरी उगाने के लिए समय उपयुक्त है| जीवाणु झुलसा रोग (वैक्टीरियल विल्ट) प्रभावित क्षेत्रों में जीवाणु झुलसा रोग प्रतिरोधी किस्मों जैसे टमाटर (पालम पिंक, पालम प्राइड), बैंगन (पी.पी.सी. अर्का निधी, अर्का केशव, अर्का नीलकण्ठ व हिसार श्यामल), शिमला मिर्च (येलो बंडर) तथा लाल मिर्च (सूरजमुखी) आदि का ही चयन करें|

  2. भिण्डी तथा फ्रासबीन की सुधरी किस्मों की बीजाई करें|

  3. भिण्डी एवं फ्रासबीन में खरपतवार नियन्त्रण के लिए 320 मि.ली. लासो (एलाक्लोर) या स्टाम्प (पैणिडमिथेलिन) प्रति बीघा की दर से 60 ली. पानी में घोलकर बीजाई के तुरन्त बाद छिड़काव करें|

  4. प्याज की फसल में निराई-गुड़ाई करें तथा नत्रजन (3-4 कि.ग्रा. यूरिया या 6-8 कि.ग्रा. कैन प्रति बीघा) डालें|

ऊंचे पर्वतीय क्षेत्र :

  1. मौसम खुल जाने पर ही मटर की जल्दी तैयार होने वाली किस्मों जैसे अरकल, मटर अगेता इत्यादि की बीजाई करें|

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Visitor No.: 06339478   Last Updated: 13 Jan 2016