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52 सप्ताह हेतु कृषि कार्यों की रुपरेखा

जनवरी फ़रवरी मार्च अप्रैल मई जून
जुलाई अगस्त सितम्बर अक्टूबर नवंबर दिसम्बर

मई (19 से 23 सप्ताह)


  1. खरीफ मौसम में बोई जाने वाली फसलों हेतु आवश्यक बीज एवं रासायनिक उर्वरक मात्रा के सुनिशित व्यवस्था की ओर ध्यान दें|

  2. जहां संभव हो ग्रीष्मकालीन जुताई करें| मेढ़ों की सफाई करें ताकि खरपतवार, व्याधि एवं कीट प्रकोप पर नियन्त्रण हो सकें|

  3. मई माह में आलू की फसल तैयार हो जाती है| आलूओं को खेतों से निकालते समय विशेष ध्यान रखें ताकि आलू का पतंगा अपने अण्डे आलूओं में न दें सकें| आलूओं को खेत से निकालने के बाद अधिक देर तक खुला न छोड़ें या उन्हें तरपाल आदि से ढक कर रखें| गोदाम में रखने के लिए स्वस्थ आलूओं को नीला फूलणु/लाल फूलणु के सूखे पत्तों के पाऊडर या सूखी रेत की 2 सैं‌.मी तह से ढक दें या 8 मि.ली. साईपरमैथ्रिन 10 ई.सी. को 1 कि.ग्रा. रेत के साथ मिला कर एक क्विंटल आलूओं के ऊपर गोदाम में बुरकाव करें| 

  4. यदि मक्की या अन्य फसलों के खेत में मोथा खरपतवार की गम्भीर समस्या हो तो राऊणडअप/गलाईसेल (150 मि.ली.) ओर अमोनिया सल्फेट उर्वरक (0.5 प्रतिशत) के मिश्रण को 60 लीटर पानी में मौथा खरपतवार की शशक्त बढ़ोतरी की अवस्था में गेहूं या अन्य रबी फसल की कटाई के बाद या मक्की या अन्य फसल की बीजाई से 7-10 दिन पहले छिड़काव करें|

  5. उन खेतों में जहां धान की बुआई की जानी है, सभी मेढ़ों की मुरम्मत करें तथा खेत में देसी खाद डालकर जुताई करें ताकि बुआई या रोपाई से पहले खाद अच्छी तरह गल सड़ जाए| जहां धान की खेती मच विधि से होती है, खेतों में पानी डाल दें| 

  6. धान की पालम धान-975, हिमालय-2216, आर पी 2421, हिमालय-741 हिमालय-799 तथा आई आर- 579 किस्मों की पनीरी व सीधी विधि से बुआई 20 मई के बाद करें| बासमती (कस्तूरी बासमती व हसन सराय) किस्मों की पनीरी की बुआई व सीधी बीजाई मई 15-30 तक करें| धान की सीधी सूखी बीजाई के समय पर्याप्त नमी को सुनिश्चित करें|

  7. सीधी सूखी बीजाई में धान का बीज 8-10 कि.ग्रा. प्रति बीघा हल के पीछे 20 सैं.मी. दूरी की कतारों में 3-4 सैं.मी. गहरा डालें|

  8. सूखी सीधी विधी द्वारा बीजाई में खरपतवार नियन्त्रण के लिए रोनस्टर (आक्साडाईजोन) 240 मि.ली./बीघा या मचैटी (ब्यूटाक्लोर) 50 ईसी 240 मि.ली./बीघा 64 लीटर पानी में छिड़काव पौध व खरपतवार निकलने से पहले (बीजाई के 2 दिन बाद) करें| 

  9. मच्च किए गए खेत खेत में अंकुरित बीज की छटा विधि से सीधी बीजाई में खरपतवार नियन्त्रण के लिए 160 मि.ली ब्यूटाक्लोर+रोफनर 50 ई.सी. को 60 लीटर पानी में घोलकर बीजाई के 3-7 दिन के अन्दर प्रति बीघा छिड़काव करें|

  10. ऊँचे पर्वतीय क्षेत्रों में मक्की की बुआई 15 मई के बाद करें| लेकिन जहां मक्की की एक ही फसल ली जाती है बीजाई मई के प्रथम सप्ताह तक पूरी कर लें| मध्यवर्ती क्षेत्रों में मक्की की बुआई 20 मई के बाद करें|

  11. मध्यवर्ती पर्वतीय क्षेत्रों में रेणुका (डी.के.एच. 9705, गिरिजा व अर्ली कम्पोजिट व निचले पर्वतीय क्षेत्रों में से रेणुका गिरिजा (एल-118), सरताज हिमालय+नवीन कम्पोजिट किस्में लगाए| बेबी कार्न के लिए वी.एल-42 व अर्ली कम्पोजिट किस्में बोयें| 

  12. मक्की की अधिक उपज लेने के लिए इसे हल के पीछे 60 सैं.मी. की दूरी की कतारों में और बीज से बीज 20 सैं.मी. की दूरी पर बीजें| बीज को 3-5 सैं.मी. गहरा बीजें| बेबी कार्न के लिए 40x175-20 सैं.मी. का अन्तर रखें| एक बीघे के लिए अन्न फसल के लिए 1.6 कि.ग्रा. व बेबी कार्न के लिए 4 कि.ग्रा./बीज पर्याप्त होता है|

  13. अधिक वर्षा वाले क्षेत्रों में मक्की की संकर व कम्पोजिट किस्मों के लिए बीजाई के समय यूरिया या कैन, एस.एस.पी. व एम.ओ.पी की मात्रा क्रमशः 7 या 12.7, 30 व 5 कि.ग्रा./बीघा डालें| स्थानीय किस्मों के लिए यह मात्रा क्रमशः 4.7 या 8.3, 20 व 4 कि.ग्रा./बीघा रखें| कम वर्षा वाले क्षेत्रों में संकर व कम्पोजिट किस्मों में इन उर्वरकों की मात्रा क्रमश: 5 या 9.7, 22 व 4 कि.ग्रा. व स्थानीय किस्मों के लिए 3.3 या 6.3, 15 व 3 कि.ग्रा./बीघा डालें| बेबी कार्न में नाइट्रोजन उर्वरकों की मात्रा में 25 प्रतिशत (यूरिया या कैन 16.0 कि.ग्रा. बीघा) बढ़ा लें| 

  14. बारानी परिस्थिति में मक्की के खेत में, चील की पत्तियां या कोई अन्य स्थानीय घास-फूस को 8 कि. /बीघा भूमि पर बिछायें ताकि फसल को नमी की कमी न झेलनी पड़े|

  15. मक्की में खरपतवार नियन्त्रण के लिए टेफाजिन या एट्राटाफ या मैसटाफ या रसायनाजिन 50 डब्ल्यु.पी. का 60-64 लीटर पानी में बीजाई के 2 दिन के अन्दर छिड़काव करें| हल्की, मध्यम एवं भारी मिट्टियों में शक्नाशी की मात्रा क्रमशः 100-140, 140-180 एवं 180-220 ग्रा. /प्रति बीघा रखें|

  16. मक्की के साथ फलीदार फसलों की मिश्रित खेती में बीजाई के 48 घंटे के अंदर सैटरान (240 मि.ली.)/लासो (240 मि.ली.)/स्टाम्प (360 मि.ली.) प्रति बीघा छिड़काव या बासालिन (180 मि.ली.) प्रति बीघा बीजाई से पहले 60-64 लीटर पानी में छिड़काव करें|

  17. खंड 1 व खंड 2 के निचले पर्वतीय क्षेत्रों के शुष्क भागों में मई के अन्तिम सप्ताह में अरहर की लम्बी किस्मों को 50 सैं.मी. के अन्तर की कतारों में तथा बौणीकिस्मों (सरिता) को 30-35 सैं.मी. की अंतर की कतारों में 15-20 सैं.मी. बीज से बीज के अंतर पर बीजे| बीजाई के समय 2.6 कि.ग्रा. यूरिया या 48 कि.ग्रा. कैन व 22.5 कि.ग्रा. एस.एस.पी डालें|

  18. लाहौल स्पीति व पांगी क्षेत्रों में मई के पहले पखवाड़े में गेहूं (अराधना व सप्त्धारा) की बीजाई करें|

  19. किन्नौर में गेहूं में यूरिया (5.2 कि.ग्रा./बीघा) या कैन (9.6 कि.ग्रा./बीघा) बालियाँ निकालने (45-60 दिन बाद) के समय डालें|

  20. लाहौल, पांगी, स्पीति व किन्नौर के ऊपरी क्षेत्रों में मई का दूसरा पखवाड़ा जौ की बीजाई के लिए उत्तम समय है| 10 कि.ग्रा. बीज/बीघा 15 सैं.मी. के अंतर की कतारों में बीजें| बीजाई के समय 3.5 कि.ग्रा. यूरिया 6.4 कि.ग्रा. कैन, 12.5 कि.ग्रा. एस.एस.पी. तथा 2 कि.ग्रा. एम.ओ.पी. प्रति बीघा डालें|

  21. दूसरे पखवाड़े में फाफरा (के.बी.बी. 3 व संगला बी-1) की बीजाई 35 सैं.मी. के अंतर की कतारों में केरा विधि से करें| बीज की मात्रा 3.2 कि.ग्रा./बीघा रखें| छट्टा विधि व अधिक मात्रा में बीज का प्रयोग न करें| बीजाई के समय यूरिया या कैन (3.4 या 6.4 कि.ग्रा./बीघा) व एस.एस.पी. (20 कि.ग्रा./बीघा) डालें| बीजाई के बाद खरपतवार नियन्त्रण के लिए लासो 160-240 मि.ली. 64 लीटर पानी में प्रति बीघा छिड़काव करें|

  22. ऊँचे पर्वतीय क्षेत्रों में राजमाश की बीजाई से पहले विभिन्न बिमारियों से बचाव के लिए बीज का बैवस्टीन 50 डब्ल्यू.पी. (2.5 प्रति कि.ग्रा. बीज) से उपचार अवश्य करें|

  23. राजमाश (त्रिलोकी, बासपा, कंचन व कैलाश) की बीजाई मई के दूसरे पखवाड़े में 30-35x8-10 सैं.मी. के अंतर पर करें| 8 कि.ग्रा. बीज/बीघा पर्याप्त होता है| बीजाई के समय 3.5 कि.ग्रा. यूरिया या 6.4 कि.ग्रा. कैन, व 30 कि.ग्रा. एस.एस.पी. डालें| खरपतवार नियन्त्रण के लिए स्टाम्प 320 मि.ली. या लासो 240 मि.ली. या डयूअल 240 मि.ली. प्रति बीघा 64 लीटर पानी में बीजाई के 48 घंटे के अंदर छिड़काव करें|

  24. मई के पहले से तीसरे सप्ताह में रागी (वी.एल.-117, वी.एल.-204 व वी.एल. - 115) की बीजाई 25 सैं.मी. अंतर की कतारों में करें| 1.5 कि.ग्रा. बीज एक बीघे पर्याप्त होता है| बीजाई के समय 3.5 कि.ग्रा. यूरिया या 6.4 कि.ग्रा. कैन व 10 कि.ग्रा. एस.एस.पी. प्रति बीघा डालें|

  25. चोलाई (अन्नपूर्णा, पी.आर.ए.-9401 तथा सवरणा) मई के दूसरे पखवाड़े में बीजे| 400 ग्रा. बीज/बीघा पर्याप्त होता है| बीजाई केरा विधि से 40-45 सैं.मी. के अंतर की कतारों में करें| बीजाई के समय 3.5 कि.ग्रा. यूरिया, 15 कि.ग्रा. एस.एस.पी. व 2.7 कि.ग्रा. एम.ओ.पी. डालें|

  26. कुठ में अंकुरण के बाद मई में सिंचाई करने के उपरांत यूरिया, एस.एस.पी. व एम.ओ.पी. क्रमशः 4.4, 12.5 व 3.4 कि.ग्रा./बीघा प्रति वर्ष डालें| यही मात्रा तीन वर्ष लगातार देने से फसल पकती है| हर वर्ष निराई-गुड़ाई करें| 

चारे की फसलें


  1. अप्रैल में बोई मक्की+रौंगी की चारे की फसल में यूरिया या कैन (6.9 या 12.8 कि.ग्रा./बीघा) की दूसरी मात्रा का उपयोग बीजाई के एक महीने के बाद करें|

  2. शुरू मई में ज्वार व मक्की की चारे की फसल में निराई-गुड़ाई करें| फसल की घुटनों तक की अवस्था में यूरिया (3.5 कि.ग्रा./बीघा) को छंट्टा दें|

  3. मई के पहले सप्ताह में सिटेरिया की सिटेरिया-92, नन्दी, पी.एस.एस.-1 किस्मों की पौध तैयार करने के लिए नर्सरी की बीजाई करें| बीज 5 सैं.मी. से अधिक गहरा न डालें| बीजाई के बाद जब तक पौधे न निकले सिंचाई करते रहे|


सब्जियां


 

निचले पर्वतीय क्षेत्र

  1. इस समय बैंगन की सुधरी प्रजातियों जैसे अर्का निधि, पी.पी.सी., अर्का केशव, अर्का नीलकन्ठ, हिसार श्यामल तथा पूसा क्रान्ति और लाल मिर्च की प्रजातियों सूरजमुखी, सी.एच. 1 (संकर) व सी.एच. 3 (संकर) किस्मों की पनीरी भी उगाई जा सकती है| पनीरी उगाने के लिए 3 मीटर लम्बी, एक मीटर चौड़ी तथा 10-15 सैं.मी. ऊँची क्यारियों में 20-25 कि.ग्रा. खूब गली-सड़ी गोबर की खाद, 200 ग्रा. सिंगल सुपर फास्फेट, 15-20 ग्रा. इण्डोफिल एम 45 तथा 20-25 ग्रा. थीमेट या फोलीडाल धूल मिट्टी की ऊपरी सतह में मिलाने के उपरान्त 5 सैं.मी. पंक्तियों की दूरी पर बीज की पतली बीजाई करें| 

  2. बैंगन में तना व फल छेदक कीट से ग्रस्त टहनियों व फलों को काट कर नष्ट कर दें ताकि कीट अन्य स्वस्थ पौधों ग्रस्त न कर सकें| बैंगन में इन कीटों का अधिक प्रकोप होने की स्थिति में कार्बेरिल 50 डब्ल्यू. पी. (120 ग्रा. प्रति 60 ली. पानी प्रति बीघा क्षेत्र के लिए) या 45 मि.ली. एन्डोसल्फान 35 ई.सी या 30 मि.ली. फैनबलरेट 20 ई.सी. को 60 लीटर पानी में घोल बना कर प्रति बीघा क्षेत्र से छिड़काव करें|

  3. कद्दू वर्गीय सब्जियों जैसे खीरा, करेला, घीया, पण्डोल, तोरी इत्यादि की बीजाई भी तैयार खेतों में थाले बनाकर या समतल खेतों में की जा सकती है|

  4. विभिन्न कद्दूवर्गीय सब्जियों की प्राम्भिक अवस्था में हानि पहुँचाने वाले कीटों के नियन्त्रण के लिए मैथालियान 50 ई.सी. (1 म.ली. प्रति लीटर) या एन्डोसल्फान 35 ई.सी.(1.5 मि.ली.प्रति लीटर) का छिड़काव करें|

  5. विभिन्न कद्दूवर्गीय सब्जियों की प्राम्भिक अवस्था में हानि पहुँचाने वाले कीटों के नियन्त्रण के लिए मैथालियान 50 ई.सी. (1 म.ली. प्रति लीटर) या एन्डोसल्फान 35 ई.सी.(1.5 मि.ली.प्रति लीटर) का छिड़काव करें|

  6. खेतों में लगी हुई सभी प्रकार की सब्जियों में निराई-गुड़ाई करें तथा अनुमोदित नत्रजन की मात्रा (3-4 कि.ग्रा. यूरिया या 6-8 कि.ग्रा. कैन प्रति बीघा की दर से) सब्जियों में डालें|

  7. मई माह में आलू की फसल तैयार हो जाती है तथा आलूओं को खेतों से निकालते समय विशेष ध्यान रखें ताकि आलू क पतंगा अपने अण्डे आलूओं में न दे सके| कीट के प्रकोप से बचाव के लिए आलूओं को खेत से निकालने के बाद अधिक देर तक खिला ना छोड़ें या उन्हें तरपाल आदि से ढक कर रखे ताकि आलू का पतंगा उसमें अपने अण्डे न दे सके| गोदाम में रखने के लिए स्वस्थ आलूओं को नीला फूलणु/लाल फूलणु के सूखे पत्तों के पाऊडर या सूखी रेत की 2 सैं.मी तह से ढक दें या 8 मि.ली. साईपरमैथ्रिन 10 ई.सी. को 1 कि.ग्रा. रेत के साथ मिला कर एक क्विंटल आलूओं के ऊपर गोदाम में बुरकाव करें|

  8. टमाटर में फलचछेदेक सुंडियों के नियन्त्रण के लिए 40 ग्रा. एसिफेट 75 एस.पी. या 85 मि.ली. एन्डोसल्फान 35 ई.सी. या 45 मि.ली. साईपरमैथ्रिन 10 ई.सी. या 45 मि.ली. डाईपल 8 एल+ 45 मि.ली. एन्डोसल्फान 35 ई.सी. के मिश्रण को प्रति 60 लीटर पानी में घोल कर फूल आने की अवस्था पर प्रति बीघा छिड़काव करें|

मध्य पर्वतीय क्षेत्र:

  1. इस समय भी टमाटर, बैंगन, शिमला मिर्च, लाल मिर्च की तैयार पौध की रोपाई की जा सकती है| खेत तैयार करते समय 20 क्विंटल गोबर की गली सड़ी खाद तथा रोपाई के समय 16 कि.ग्रा. कैन, 38 कि.ग्रा. सुपर फास्फेट तथा 7 कि.ग्रा. म्यूरेट आफ पोटाश प्रति बीघा खेतों में मिलाएं|

  2. कद्दू वर्गीय सब्जियों जैसे खीरा, करेला, घीया, तोरी, पाण्डोल इत्यादि की सीधी बीजाई समतल खेतों या क्यारियां/नालियां बनाकर इनके दोनों तरफ की जा सकती है|

  3. खेतों में लगी हुई सब्जियों में निराई-गुड़ाई करें तथा नत्रजन (3-4 कि.ग्रा. यूरिया या 6-8 कि. ग्रा. कैन प्रति बीघा) फसलों में गुड़ाई के समय डालें|

ऊंचे पर्वतीय क्षेत्र :

  1. इस महीने में फ्रांसबीन की सुधरी बौनी किस्मों (कन्टडर, प्रीमियर, पूसा पार्वती, अर्का कोमल) की बीजाई पंक्तियों में 30-45 सैं.मी. तथा पौधों में 10-15 सैं.मी. की दूरी पर करें| खेत तैयार करते समय 16 क्विंटल गोबर की गली-सड़ी खाद तथा बीजाई के समय 16 कि.ग्रा. कैन, 50 कि.ग्रा. सिंगल सुपर फास्फेट तथा 7 कि.ग्रा. म्यूरेट आफ पोटाश खादों का मिश्रण प्रति बीघा पंक्तियों में डालकर बीजाई करें|

  2. जड़दार सब्जियों जैसे मूली, शलजम, गाजर, चुकन्दर, चिकोरी तथा पालक की सीधी बीजाई भी की जा सकती है|

  3. मटर की जल्दी तैयार होने वाली किस्मों (अरकल, मटर, अगेता) तथा मुख्य मौसम की किस्में (आज़ाद पी. 1, लिंकन तथा पालम प्रिया) की सीधी बीजाई भी की जा सकती है|

  4. इस समय आलू की सुधरी किस्मों कुफरी गिरिराज, कुफरी चंद्रमुखी की बीजाई करें| बीजाई बीजाई के लिए स्वस्थ, रोगरहित, साबुत या कटे हुए कन्द (वजन लगभग 30 ग्रा.) जिनमें कम से कम 2 आंखे हों, को प्रयोग करें| बीजाई से पहले कन्दो को एण्डोफिल एम 45 (25 ग्रा. प्रति लीटर पानी) के घोल में आधे घण्टे तक भिगोने के उपरान्त छाया में सुखाकर बीजाई करें|

  5. इस महीने फूलगोभी तथा बन्दगोभी की पनीरी उगाने के लिए बीज की क्यारियों में बीजाई भी की जा सकती है|

  6. अगर टमाटर, शिमला मिर्च, बन्दगोभी, फूलगोभी, तथा ब्राकली की रोपाई योग्य पनीरी उपलब्ध हो तो अच्छी तरह तरह से तैयार खेतों में पौधरोपण करें|

  7. खीरे की स्वस्थ पौध की रोपाई भी कर दें|

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Visitor No.: 06339552   Last Updated: 13 Jan 2016