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52 सप्ताह हेतु कृषि कार्यों की रुपरेखा

जून (24 से 27 सप्ताह)


  1. इस महीने के प्रथम पखवाड़े में खेत तैयार करने के लिए गहरा हल चलाएं तथा गोबर की खाद खेतों में डालते समय ध्यान दें कि यह बिल्कुल गली-सड़ी हो अन्यथा विभिन्न भूमिगत कीटों का प्रकोप अधिक होगा| अगर संभव हो तो खेतों में सुबह के समय गहरा हल चलाकर पूरा दिन खुला रखें तथा शाम के समय सुहागा लगाएं ताकि तेज धूप के कारण विभिन्न भूमिगत कीट नष्ट हो सकें|

  2. धान की बासमती किस्मों की रोपाई 20 जून से तथा अन्य लम्बी व बौनी किस्मों की 15 जून से प्रारम्भ करें| पौधे की कतारों में केवल 3 सैं.मी. गहराई तक लगाएं| एक स्थान पर 2-3 पौधे ही रोपें| लम्बी व बौनी किस्मों में समय की रोपाई के 15x20 सैं.मी. की दूरी पर पौधे लगाएं| परन्तु बासमती किस्मों को 15x15 सैं.मी. की दूरी पर ही लगाएं|

  3. धान की उन्नत किस्मों के लिए यूरिया, एस.एस.पी. 9 एम.ओ.पी. 16x20 तथा 5 कि.ग्रा./ बीघा अनुमोदित किया गया है| लेकिन स्थानीय किस्मों के लिए यूरिया व कि.ग्रा., एस.एस.पी. 12 कि.ग्रा. व पोटाश 3 कि.ग्रा. प्रति बीघा डाला जाता है| सारी एस.एस.पी. व एम.ओ.पी. और आधी यूरिया अन्तिम बार मच्च करते समय या रोपाई से 1-3 दिन पहले ऊपर की 10 सैं.मी. कीचड़ में मिलाएं|

  4. उन भूमियों में जहां सारा लाल पानी खड़ा रहता है और केवल धान ही की फसल ली जाती है यूरिया और एस.एस.पी. क्रमशः 5.3 और 20 कि.ग्रा./बीघा डालें|

  5. धान में रोपाई विधि में खरपतवार नियन्त्रण के लिए निम्न शक्नाशियों को उपयोग करते है :-

    1. 2.4 कि.ग्रा. मचैटी/ मासक्लोर (5 प्रतिशत दानेदार) 4-5 सैं.मी. खड़े पानी में या 240 मि.ली. मचैटी/मासक्लोर 50 ई.सी. को 12 कि.ग्रा. रेत में मिलाकर रोपाई के 4-5 दिन के बाद प्रति बीघा डालें|

    2. स्टाम्प (5 प्रतिशत दानेदार) 2.4 कि.ग्रा./बीघा या स्टाम्प 30 ई.सी. 320 मि.ली./बीघा रोपाई के 4-5 दिन के बाद|

    3. गोल (1 प्रतिशत दानेदार) 1.2 कि.ग्रा./बीघा या गोल 23.4 ई.सी. 48 मि.ली./बीघा रोपाई के 4-5 दिन के बाद डालें|

    4. यदि चौड़ी पत्तों वाले खरपतवार हो तो 2,4- डी.ई.ई. (4 प्रतिशत दानेदार) 1.6 कि.ग्रा./बीघा रोपाई के 4-5 दिन के बाद डालें| हल्की भूमियों में खरपतवारनाशियों की मात्रा 2.5 प्रतिशत कम कर दें| रेत में मिलाते समय हाथ में दस्ताने पहन लें|

  6. उन मिट्टियों में जहां जस्त की कमी पाई जाती हो, जिंक सल्फेट (2 कि.ग्रा./बीघा) डालकर ठीक किया जा सकता है| परन्तु इसके प्रयोग से पहले मिट्टी क विश्लेषण किया जाना चाहिए| पौधे की रोपाई से पहले 1-4 प्रतिशत जिंक आक्साईड के घोल में डुबोकर भी जिंक की कमी को पूरा किया जा सकता है| जिंक सल्फेट को फास्फोरस उर्वरक देने के दो दिन बाद ही खेत में डालना चाहिए|

  7. धान की फसल में ब्लास्ट रोग से बचाव के लिए रोग प्रतिरोधी क्षमता वाली नवीनतम किस्मों का चयन करें तथा बिजाई से पहले बैव्सटीन 50 डब्ल्यू.पी. या बीम 75 डब्ल्यू.पी. (2 ग्रा. प्रति कि.ग्रा. बीज) से बीज का उपचार करें| धान की नरसरी में ब्लाईटाक्स 50 (12 ग्रा. प्रति 4 ली. पानी प्रति 100 वर्ग मीटर क्षेत्र) का छिड़काव करें|

  8. ऊँचे पर्वतीय क्षेत्रों में मक्की की बुआई प्रथम सप्ताह तक पूरी कर लें| मध्यवर्ती क्षेत्रों में 15 जून तथा निचले पर्वतीय क्षेत्रों में 15-30 जून तक करें|

  9. उन क्षेत्रों में जहां मक्की की बढ़ोतरी घुटनों तक की अवस्था में हो, नत्रजन खाद की दूसरी मात्रा डालें| अधिक वर्षा वाले क्षेत्रों में, संकर व कम्पोजिट किस्मों एवं स्थानीय में युरिया या कैन क्रमशः 7 या 12.7 एवं 4.7 व 8.3 प्रति बीघा डालें| कम वर्षा वाले क्षेत्रों में क्रमशः युरिया या कैन 5 या 9.7 एवं 3.3 या 6.3 कि.ग्रा. प्रति बीघा डाले| बेबी कार्न में युरिया या कैन 8.7 या 16 कि.ग्रा./बीघा डालें|

  10. जिन क्षेत्रों में मक्की को क्षति पहुँचाने वाले कीटों जैसे कटुआ (टोका), दीमक व सफेद सुंडी आदि का प्रकोप अधिक होता है, वहां पर मक्की की बीजाई करने से पहले 160 मि.ली. क्लोरपाईरिफास 20 ई.सी. कीटनाशक को 2 कि.ग्रा. रेत में मिश्रित करके एक बीघा क्षेत्र में मिट्टी में मिला दें|

  11. जून के अन्त में अच्छे जल निकास वाली दोमट से हल्की दोमट भूमियों में माश (यू.जी. 218, पन्त यू 19 (खण्ड-1), पी.डी. यू-1 (कुल्लू घाटी) व टी -9 (खण्ड -1) व मूंग (सुकेती-1, शाईनिंग मूंग-नम्बर-1 व पूसा बैसाखी) की बीजाई करें| बीज की मात्रा 15-16 कि.ग्रा./बीघा व कतारों के बीच का अन्तर 30 सैं.मी. रखें| मिश्रित खेती में युरिया या कैन न डालें| उन भूमियों में जहां माश या मूंग पहली बार बोये जा रहे हों, राइजोबियम से बीज का टीकाकरण करें|

  12. मध्य जून के आसपास पहली मानसून की वर्षा होने पर सोयाबीन (शिवालिक, पंजाब न.-1, ली. ब्रेग, हरित सोया व पालम सोया) की बीजाई करें| सिंचित परिस्थितियों में 6 कि.ग्रा. व असिंचित क्षेत्रों में बीज 8 कि.ग्रा./बीघा पर्याप्त होता है| फसल को 45 सैं.मी. दूरी की पंक्तियों में बीजें| बीज 3-4 सैं.मी. गहरा व बीज की परस्पर दूरी 10-15 सैं.मी. रखें| बीजाई के समय 3.5 कि.ग्रा. युरिया या 6.4 कि.ग्रा. कैन, 30 कि.ग्रा. एस.एस.पी. व 5.4 कि.ग्रा. एम.ओ.पी. प्रति बीघा डालें| खरपतवार नियन्त्रण के लिए बीजाई के तुरन्त बाद या 2 दिन के अन्दर, गोल (80 मि.ली./बीघा) या सैटरन (240 मि.ली./बीघा) या स्टाम्प (360 मि.ली./बीघा) या बलेजर (80 मि.ली./बीघा) का छिड़काव करें| बासालिन (160 मि.ली/बीघा) का छिड़काव बीजाई से पहले करें| भूमि की 3-4 सैं.मी. समूह में मिलाएं| बासालिन का छिड़काव केवल शाम के समय ही करें|

  13. जून के अन्त में मानसून के शुरू होते ही कुल्थी (बैजू/एच.पी.के-4) को अच्छे जल निकास वाले ढलान-दार खेतों में केरा विधि से 30 सैं.मी. अन्तर की कतारों में बीजें| बीज की मात्रा, शुद्ध फसल में 1.5-1.6 कि.ग्रा. बीघा व मक्की के साथ मिश्रित खेती में 0.65-0.80 कि.ग्रा./बीघा होनी चाहिए| बीजाई के समय युरिया या कैन (2.5 या 5.0 कि.ग्रा. बीघा) व एस.एस.पी. (22 कि.ग्रा./बीघा) डालें| मक्की के साथ मिश्रित खेतों में युरिया या कैन डालने की आवश्यकता नही होती है|

  14. सुरजमुखी की बसंत ऋतु की कटाई उस समय करें जब फूल के सिर का पिछला भाग पीला पड़ने लगे और फूल के बीच का भाग गहरा भूरा हो जाए|

  15. मौनसून आरम्भ होते ही कम वर्षा वाले क्षेत्रों में सूरजमुखी (ई.सी. 86413) की खरीफ फसल की बीजाई कर लें|

  16. पंजाब व हरयाणा के साथ लगते क्षेत्रों-ऊना, नालागढ़ और पांवटा के निचले क्षेत्रों में मूंगफली (पंजाब मूंगफली न.-1, एम-45 एम-13, सी-50 व एम -37) की महीने के दूसरे पखवाड़े में बीजाई करें| मध्यम फैलने वाली (सी-501) एवं अधिक फैलने वाली किस्मों के लिए अन्तर क्रमशः 30-40x15 सैं.मी. एवं 50x22 सैं.मी. रखें| बीज दाने की मात्रा किस्म के अनुसार 7-9 कि.ग्रा./बीघा पर्याप्त होती है| बीजाई के समय कैन, एस.एस.पी. एवं एम.ओ.पी. क्रमशः 5,20 व 3 कि.ग्रा./बीघा डालें|

  17. मौनसून आरम्भ होने से पहले (जून के दूसरे पखवाड़े में) गन्ने की फसल में मिट्टी चढ़ा दें| 

  18. निचले क्षेत्रों में चोलाई की बीजाई जून के आरम्भ से जून के अन्त तक करें|

  19. निचले एवं मध्यवर्ती क्षेत्रों की असिंचित परिस्तिथियों में राजमाश की बीजाई मौनसून के आरम्भ होते ही करें| सिंचित क्षेत्रों 15-30 जून में बोयें|

  20. जहां संभव हो खेतों को हल चलाकर गर्मी में खुला छोड़ दें|

  21. खण्ड 4 में जौ में पहली सिंचाई( बीजाई के 21-25 दिन बाद) के बाद युरिया या कैन (3.5 या 6.4 कि.ग्रा./बीघा) खड़ी फसल में छिटकें|

  22. यदि फाफरा की बीजाई मई में नही की गई हो तो इसे मध्य जून तक बीज लें| पौधों की क्लीपिंग व सिंचाई के उपरान्त (30-35 दिन के बाद) युरिया या कैन (3.4 या 6.4 कि.ग्रा./बीघा) की दूसरी एवं अन्तिम मात्रा खड़ी फसल में छिटके|

  23. जून की दूसरे पखवाड़े में मीठा काठु (ओग्ला) की ओ.सी-2 व स्थानीय किस्मों की बीजाई करें| इसके लिए समय क्रियायें फाफरा की भान्ति ही है|

  24. ऊँचे पर्वतीय क्षेत्रों में यदि राजमाश मई में नही बोया गया हो तो बीजाई जून के पहले पखवाड़े में करें| बीजाई के 20-25 दिन बाद सिंचाई के उपरान्त युरिया या कैन (3.5 या 6.4 कि.ग्रा./बीघा) खड़ी फसल में छिटकें|

  25. सभी फसल में अधिक पौधों को निकाल लें व सिंचाई के उपरांत युरिया या कैन (3.5 या 6.4 कि.ग्रा./बीघा) डालें|

चारे की फसलें


  1. मक्की, चारा, ज्वार, बजरा (एल-72, स्थानीय किस्में) एवं मकचरी की मौनसून फसल की बीजाई बारिशें आरम्भ होने पर करें| 

  2. मकचरी के लिए बीज मात्रा 3.6 कि.ग्रा./बीघा पर्याप्त होती है| फसल 30 सैं.मी. अंतर की कतारों में केरा विधि से बीजें| बीजाई के बाद भारी सुहागा चलाएं| बीजाई के समय 7.8 कि.ग्रा. यूरिया या 14.4 कि.ग्रा. कैन व 30 कि.ग्रा. एस.एस.पी. प्रति बीघा डालें| 

  3. रौंगी (रशियन जायन्ट) सेम (पालमपुर सलेक्शन-1) व फील्ड बीन की बीजाई अकेले या मक्की, ज्वार, मकचरी, नेपियर बाजरा हाईब्रिड के साथ मिश्रित बोयें| मुख्यतः फलीदार फसलों को इन फसलों के साथ बोने से अधिक उपज मिलती है तथा चारे की गुणवत्ता बढ़ जाती है| मकई+ रौंगी/फील्ड बीन व मकचरी+मखमली सेम की बीजाई जून के पहले पखवाड़े में तथा नेपियर बाजरा हाईब्रिड+मखमली सेम व सिटेरिया+मखमली सेम की मिश्रित खेतों में फलीदार फसल की काश्त मास की पूरी अवधि में कर सकते है| 

  4. अगेती मक्की में नरफूल निकलते ही व ज्वार में यूरिया या कैन (3.5 या 6.4 कि.ग्रा/बीघा) का छिट्टा दें| 

  5. बसंत में बोया नेपियर बाजरा हाईब्रिड की पहली कटाई एवं सिंचाई के बाद यूरिया या कैन (69 या 12.8 कि.ग्रा./बीघा) डालें| 

  6. मौनसून के आरम्भ होते ही नेपियर बाजरा हाईब्रिड (आई जी एफ आर आई-5, एं बी-37 व एं बी-21) की किस्मों को 60x60 सैं.मी. के अंतर पर रोपें|

सब्जियां

निचले पर्वतीय क्षेत्र

  1. महीने के दूसरे पखवाड़े में किसान अदरक, हल्दी, अरबी, कचालू इत्यादि की बीजाई करें| बीजाई के लिए अदरक की सुधरी प्रजातियों जैसे हिमगिरी तथा हल्दी, अरबी व कचालू में स्थानीय किस्मों के स्वस्थ बीज के ही चयन करें| बीजाई के पूर्व कन्दो को 25 ग्राम इण्डोफिल एम 45 व 40 ग्राम बैविस्टीन प्रति 10 लीटर पानी के घोल में आधे घण्टे तक उपचार करें तथा उपचारित कन्दों को छाया में सुखाने के उपरान्त पंक्तियों में 20 सैं.मी. तथा कन्दों के बीच की दूरी 15 सैं.मी. रखकर 3-4 सैं.मी. गहरी बीजाई करें| बीजाई से पहले 2-3 बार खेतों की अच्छी तरह जुताई करें तथा 20-25 क्विंटल प्रति बीघा गोबर की गली-सड़ी खाद मिलाएं| बीजाई के समय 16 कि.ग्रा. कैन, 24 कि.ग्रा. सिंगल सुपर फास्फेट तथा 7 कि.ग्रा. म्यूरेट ऑफ पोटाश प्रति बीघा खेतों में डालें| बीजाई के तुरन्त बाद हरी पत्तियां (10 क्विंटल) या सूखी पत्तियां (8 पत्तियां) प्रति बीघा का मल्च खेतों के ऊपर डालें| 

  2. अगेती फूलगोभी की सुधरी प्रजातियों (अरली कुंवारी, अली मारकेट, पूसा टिपाली इत्यादि) की स्वस्थ पौधे उगाने का उचित समय चल रहा है| पनीरी उगाने के लिए तीन मीटर लम्बी, एक मीटर चौड़ी तथा 10-15 सैं.मी. ऊँची क्यारी में 20-25 कि.ग्रा. गली-सड़ी गोबर की खाद, 200 ग्राम सिंगल सुपर फास्फेट, 20-25 ग्राम इण्डोफिल एम 45 तथा 15-20 ग्राम थीमेट या फोलीडॉल धूल मिट्टी की ऊपरी सतह में मिलाने के उपरान्त 5 सैं.मी. की दूरी पर बीज की पतली बीजाई करें| 

  3. असिंचित क्षेत्रों में कद्दू वर्गीय सब्जियों जैसे खीरा, करेला, कद्दू, घीया, तोरी इत्यादि की थाले बनाकर या समतल खेतों में सीधी बीजाई की जा सकती है| 

  4. दूसरे पखवाड़े में भिण्डी की सुधरी प्रजातियों जैसे पी. 8, अर्का अनामिका, परवनी क्रान्ति एवं संकर किस्मों की बीजाई पंक्तियों में 45-60 सैं.मी. तथा पौधों में 10-15 सैं.मी. की दूरी पर की जा सकती है| 

  5. खेतों में लगी हुई सभी प्रकार की सब्जियों में निराई-गुड़ाई करे तथा नत्रजन (यूरिया 3-4 कि.ग्रा. या कैन 6-8 कि.ग्रा. प्रति बीघा) गुड़ाई के समय फसलों में डालें| आवश्यकतानुसार 5-7 दिनों के अन्तराल पर सिंचाई भी करते रहे| 

  6. बैंगन तथा लाल मिर्च की तैयार पौधे की रोपाई क्रमशः 60x45 सैं.मी. तथा 45x45 सैं.मी. पंक्तियों से पंक्तियों तथा पौधों से पौधों की दूरी की जा सकती है| खेत तैयार करते समय 20 क्विंटल गोबर की गली-सड़ी खाद तथा रोपाई के समय 16 कि.ग्रा. कैन, 38 कि.ग्रा. किंगल सुपर फास्फेट तथा 3.5 कि.ग्रा. म्यूरेट आफ पोटाश प्रति बीघा खेतों में डालें| 

  7. टमाटर, बैंगन, शिमला मिर्च आदि में फलसड़न व बलाईट आदि सभी का विशेष ध्यान रखें| एहतियात के तौर पर रिडोमिल एम.जेड (25 ग्रा. प्रति 10 लीटर पानी) या डायथेन एम 45 (25 ग्रा. प्रति 10 लीटर पानी) का छिड़काव मानसून से तुरन्त पहले करें| टमाटर के पौधों को सहारा देकर सीधा रखें तथा नीचे के 15 सैं.मी. भाग में पत्ते न रहने दें| 

  8. कददुवर्गीय सब्जियों व टमाटर में फलमक्खी के प्रकोप के प्रति भी सावधान रहें| खेतों में फलमक्खी के नज़र आते ही 10 मि.ली. मेलाथियान 50 ई.सी. तथा 50 ग्रा. खांड/गुड़ के मिश्रण को 5 लीटर पानी में घोल बनाकर फसल के साथ-साथ आसपास की झाड़ियों पर भी छिड़काव करें| छिड़काव के साथ-साथ कीटग्रस्त फलों को इकठ्ठा करके जमीन में गहरा दबा दें या जला दें| 

  9. इस महीने बैंगन व टमाटर में तना व फलछेदक कीटों का अत्यधिक प्रकोप हो सकता है| अतः मई माह के अन्तर्गत सुझाए गये उपाय अपनाए|

मध्य पर्वतीय क्षेत्र:

  1. मध्य पर्वतीय क्षेत्रों में इस समय किसान अदरक, हल्दी, अरबी/कचालू इत्यादि की बीजाई करें तथा बीजाई के लिए सुधरी समय करियों को अपनाए| 

  2. भिण्डी की सुधरी प्रजातियों जैसे पी-8, परवनी क्रान्ति, अर्का अनामिका एवं संकर किस्मों तथा फ्रांसबीन की किस्मों कन्टेडर, प्रीमियर, पूसा पार्वती (झाड़ीदार, कम वर्षा वाले क्षेत्रों में) तथा लक्ष्मी, एस.बी.एम-1 (बेलनुमा व अधिक वर्षा वाले क्षेत्रों में) की बीजाई 45-60 x 10-15 सैं.मी. की दूरी पर तथा बेलनुमा किस्मों की बीजाई 90x20-30 सैं.मी. की दूरी पर करें| 

  3. बन्दगोभी की सुधरी प्रजातियों (गोल्डन एकड़, प्राईड आफ इण्डिया, पूसा मुकता, वरुण(संकर), बहार (संकर) इत्यादि की पनीरी भी इन क्षेत्रों में उगाई जा सकती है| 

ऊंचे पर्वतीय क्षेत्र :

  1. जून महीने के प्रथम पखवाड़े तक फ़्रांसबीन की बौनी किस्मों जैसे कन्टेडर, प्रीमियर, पूसा पार्वती, अर्का कोमल इत्यादि की बीजाई कर दें| 

  2. इसी समय मटर की मुख्य मौसम की किस्मों जैसे आज़ाद पी.1, लिंकन तथा पालम प्रिया इत्यादि की बीजाई भी की जा सकती है| 

  3. जड़दार सब्जियों जैसे मूली, गाजर, शलजम इत्यादि की सीधी बीजाई 25-30 सैं.मी. पंक्तियों से पंक्तियों की दूरी पर करें| 

  4. सभी प्रकार की सब्जियों में निराई-गुड़ाई करें तथा नत्रजन (यूरिया 3-4 कि.ग्रा. कैन 6-8 कि. ग्रा. प्रति बीघा) फसलों में डालें| आवश्यकतानुसार 8-10 दिन के अन्तराल पर सिंचाई भी करें| 

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