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52 सप्ताह हेतु कृषि कार्यों की रुपरेखा

जुलाई (28 से 31 सप्ताह)


  1. धान की लम्बी व बौनी किस्मों की रोपाई 7 जुलाई तक करें| देर से रोपाई करने पर लम्बी किस्मों को 15x15 सैं.मी. की दूरी पर लगाएं| 

  2. धान में यदि जिंक (जस्ता) तत्व की कमी के लक्षण जैसे रोपाई के 3-4 सप्ताह बाद या बीजाई के 7-8 सप्ताह बाद (बालियां/कसे फूटने की अवस्था) पत्तों की मध्य शिरा सफेद-पीली हो जाना (पौधे के नीचे से तीसरे या चौथे पत्तों पर प्रकट होना), पत्ते की शिरा नीचे से पीली होने परन्तु ऊपर के पत्ते हरे ही रहना, पत्तों के हल्के पीले रंग के धब्बे पड़ जाना तथा आकार में बढ़ने से आपस में मिल जाना और रंग गहरा भूरा हो जाना, धीरे-धीरे पूरा पत्ता भूरा होकर सूख जाना, दिखाई पड़ने पर जिंक सल्फेट (0.5 प्रतिशत) (400 ग्राम जिंक सल्फेट और 200 ग्राम. कैल्शियम हाइड्रोक्साईड/बीघा का छिड़काव करें| 

  3. धान के खेत में पानी खड़ा रखें एवं मक्की एवं दलहन फसलों में अधिक पानी के निकास का उचित प्रबंध करें| 

  4. धान में रोपाई के तीन सप्ताह बाद यूरिया (स्थानीय किस्में 2.25 व उन्नत किस्में 4 कि.ग्रा./बीघा) की दूसरी मात्रा का उपयोग करें| खाद डालने से पहले खेत से पानी निकाल दें| 

  5. धान में पत्ता लपेट कीट के अधिक प्रकोप होने पर फसल में 150 मि.ली. क्लोरपाईरीफॉस 20 ई.सी. प्रति 60 लीटर पानी प्रति बीघा क्षेत्र के हिसाब से छिड़काव करें| तना छेदक कीट का 5 प्रतिशत या इससे अधिक प्रकोप होने पर मिथाईल पैराथियान 50 ई.सी. (60 मि.ली. प्रति 60 लीटर पानी प्रति बीघा) का छिड़काव करें| 

  6. धान में ब्लास्ट रोग की रोकथाम के लिए दौजियां निकलने के समय 180 ग्राम ब्लाईटॉक्स 50 या 60 ग्राम बैवस्टीन को 60 लीटर पानी में घोलकर प्रति बीघा क्षेत्र में छिड़काव करें| 

  7. खरपतवार नियन्त्रण के लिए रासायनिक विधि अपनाने के साथ-साथ मक्की+सौयाबीन/माश/अदरक की मिश्रित खेती में बीजाई के 4-5 सप्ताह बाद निराई-गुड़ाई का कार्य करें| 

  8. मक्की में तना-छेदक कीट का आक्रमण होने पर कीटग्रस्त पौधों को, जिनमें छोटे-छोटे छिद्र हों, निकाल दें, या ऐसे पौधों के पर्णचक्रों में फॉरेट 10 जी. नामक दानेदार कीटनाशक के कुछ दाने डालें|

  9. मक्की में जीवाणुज तना विगलन रोग, जिससे कि रोगग्रस्त पौधों से शराब जैसी गंध आती है, से बचाव के लिए खेतों में पानी न ठहरने दें| रोगग्रस्त पौधों को मिट्टी सहित धीरे से उखाड़ कर नष्ट कर दें| इस बीमारी के लक्षण आते ही सात दिन के अंतराल पर 1320 ग्राम ब्लीचिंग पाऊडर (3 प्रतिशत) प्रति बीघा दो बार डालें| 

  10. यदि माश, मूंग व कुलथी की बुआई जून में न की हो तो इन्हें जुलाई के आरम्भ में बीज लें| 

  11. माश, मूंग व तिल की फसलों में जुलाई माह में बालों वाली सुंडियों का आक्रमण होता है जो झुंड में पलती है तथा पत्तों व कोमल बढ़ती हुई शाखाओं को खाती है| झुंड में पल रही सुंडियों को इकठ्ठा करके नष्ट कर दें| अधिक प्रकोप होने पर फसल में 90 मि.ली. एण्डोसल्फॉन 35 ई.सी. प्रति 60 लीटर पानी प्रति बीघा छिड़काव करें| 

  12. माश व मूंग आदि दलहनी फसलों में फूल आने की अवस्था पर फूल खाने वाले धारीधार भृंगो का प्रकोप कई क्षेत्रों में बहुत होता है| इन फसलों में फूल आने की अवस्था पर 120 मि.ली. एण्डोसल्फॉन 35 ई.सी. या 60 मि.ली. मिथाइल पैराथियान 50 ई.सी. को 60 लीटर पानी में घोल बनाकर प्रति बीघा छिड़काव करें| इन फसलों में पत्ता धब्बा रोग के लक्षण आने पर डायथेन एम-45 (2.5 ग्रा. प्रति लीटर पानी) या बैवस्टीन 50 मि.ली. (1ग्रा. प्रति लीटर पानी) का 5 दिन के अंतराल पर 2-3 छिड़काव करें| 

  13. खण्ड-1 में हिमाचल लोबिया-1 व खण्ड-2 में लोबिया की स्थानीय किस्मों की बीजाई केरा विधि से 45 सैं. मी. दूरी की कतारों में जुलाई के पखवाड़े में करें| बीज की मात्रा 1.2-1.6 कि.ग्रा. प्रति बीघा रखें| बीजाई के समय 3.5 कि.ग्रा. यूरिया या 6.4 कि.ग्रा. कैन, 20 कि.ग्रा. एस.एस.पी. व 2.7 कि.ग्रा. म्यूरेट ऑफ पोटाश प्रति बीघा डालें| बीजाई के बाद 240 मि.ली. लासो (अलावलोर) 50 ई.सी. 60-64 लीटर पानी में प्रति बीघा खरपतवार नियन्त्रण के लिए प्रयोग करें| 

  14. तिल (ब्रजेश्वरी/एल.ती.के-4 या पंजाब तिल न.-1) को 30 सैं.मी. अंतर की कतारों में जुलाई के आरम्भ में पोरा या ड्रिल विधि से बीजें| पौधों का अंतर 15-20 सैं.मी. रखें| ताकि शाखाएं बढ़ने में सहयता मिले| 400 ग्राम बीज/बीघा पर्याप्त होता है| बीजाई के समय यूरिया या कैन, एस.एस.पी. व एम.ओ.पी. को क्रमशः 5.2 या 9.6, 20 व 27 कि.ग्रा./बीघा डालें| असिंचित क्षेत्रों में खाद की मात्रा को क्रमशः आधा कर लें| 8. यदि सूरजमुखी (ई.सी. 68413) की गर्म ऋतु की फसल की बीजाई जून में न की हो तो जुलाई में करें| अधिक वर्षा वाले क्षेत्रों में सूरजमुखी की बीजाई जुलाई में ही करें ताकि फसल पकने के समय बारिश न हो| 

  15. ऊँचे पर्वतीय क्षेत्रों में मटर के तुड़ान के बाद खेत तैयार करने के उपरांत ओग्ला (ओ.सी.2) की बीजाई करें| 

  16. रागी के मध्य जुलाई में निराई-गुड़ाई करें| 

  17. चौलाई में बीजाई के 40-45 दिन के बाद यूरिया या कैन (3.5 या 6.4 कि.ग्रा./बीघा) डालें| 

चारे की फसलें


  1. मक्की, ज्वार, एवं बाजरा की मौनसून फसल में घुटनों तक की अवस्था में यूरिया या कैन की दूसरी मात्रा डालें| मक्की/ज्वार में यूरिया या कैन क्रमशः 3.5 या 6.4 एवं बाजरा/मकचरी से 3.9 या 7.2 कि.ग्रा./बीघा डालें| 

  2. मक्की+रौंगी की मिश्रित फसल में बीजाई के एक महीने के बाद यूरिया 6.9 या कैन 12.8 कि.ग्रा./बीघा की दूसरी मात्रा का उपयोग करें| 

  3. नर्सरी में जब सिटेरिया के पौधे 15-20 सैं.मी. लम्बे हो जाएं जुलाई में घासनियों में 30x30 सैं.मी. व खेतों में 50x50 सैं.मी. अन्तर पर रोपें| रोपाई के समय 3.5 कि.ग्रा. यूरिया या 6.4 कि.ग्रा. कैन व 20 कि.ग्रा. एस.एस.पी. प्रति बीघा डालें| 

  4. गिन्नी ग्रास के पौधों को कम उपजाऊ भूमि में 20x20 सैं.मी. के अंतर पर लगाएं| प्रत्येक बीजाई के स्थान पर 100 ग्रा. गोबर की खाद डालें| रोपाई के 20-25 दिन बाद प्रति बीघा 6.9 कि.ग्रा. यूरिया या 12.8 कि.ग्रा. कैन डालें| 

  5. शुष्क शीतोष्ण क्षेत्रों में जड़ों द्वारा टाल फैस्क्यू, आरचर्ड ग्रास, कैनरी ग्रास व टिमोथी रोपें| 

  6. शुष्क शीतोष्ण क्षेत्रों में रेड क्लोवर+ आरचर्ड ग्रास की मिश्रित खेती पशुओं के लिए पौष्टिक चारा प्रदान करती है| दोनों ही फसलों को छाया पसंद है| इस मिश्रण के लिए आरचर्ड ग्रास को 50 सैं.मी. की कतारों में लगाएं| 

सब्जियां

निचले पर्वतीय क्षेत्र

  1. जुलाई के प्रथम पखवाड़े तक भिण्डी की सुधरी प्रजातियों जैसे पी. 8, परवनी क्रान्ति, अर्का अनामिका, वर्षा उपहार व संकर किस्मों की सीधी बीजाई तैयार खेतों में पंक्तियों में 60 सैं.मी. तथा पौधों में 15-20 सैं.मी. की दूरी पर करें| खेत तैयार करते समय 8 क्विंटल, गोबर की गली-सड़ी खाद तथा बीजाई के समय 12 कि.ग्रा. कैन, 25 कि.ग्रा. सिंगल सुपर फास्फेट तथा 7 कि.ग्रा. म्यूरेट आफ पोटाश प्रति बीघा खादों को खेतों में डालें| 

  2. फूलगोभी की अगेती किस्मों की तैयार पौधे की रोपाई 45X45 सैं.मी. के अंतर पर करें| खेत तैयार करते समय 20 क्विंटल गोबर की गली-सड़ी खाद रोपाई के समय 20 कि.ग्रा. कैन, 38 कि.ग्रा. सिंगल सुपर फास्फेट तथा 10 कि.ग्रा. म्यूरेट ऑफ पोटाश/बीघा खेत में डालें| शेष कैन की 20 कि.ग्रा. मात्रा दो बराबर हिस्सों में, एक मात्रा (10 कि.ग्रा.) निराई-गुड़ाई के समय तथा दूसरी फूल बनने के समय फसल में डालें| 

  3. इस समय बैंगन तथा लाल मिर्च की तैयार पौधे की रोपाई भी क्रमशः 60X45 सैं.मी. तथा 45x45 सैं.मी. की दूरी पर की जा सकती है| 

  4. टमाटर की सुधरी किस्मों जैसे पालम पिंक व पालम प्राईड तथा संकर किस्मों जैसे रुपाली, अवतार, अविनाश ए.2, मिनाक्षी, नवीन इत्यादि की पनीरी भी उगाई जा सकती है| पनीरी उगाने के लिए तीन मीटर लम्बी, एक मीटर चौड़ी तथा 10-15 सैं.मी. ऊंची क्यारियों में 20-25 कि.ग्रा. खूब गली-सड़ी गोबर की खाद, 200 ग्राम सिंगल सुपर फास्फेट तथा 15-20 ग्राम इण्डोफिल एम. 45 तथा 20-25 ग्राम थीमेट या फोलीडाल धूल मिट्टी की ऊपरी सतह में मिलाने के उपरान्त पंक्तियों में 5 सैं.मी. की दूरी पर बीज की पतली बीजाई करें| बरसात में पनीरी को अधिक वर्षा से बचाने हेतु पोली हाऊस या पोलिटनल (छोटी सुरंगों), का प्रयोग करें| इस तरह की सुरंगों का निर्माण क्यारियों के ऊपर बीजाई के बाद किया जा सकता है| 

  5. हरे प्याज के लिए छोटी-छोटी गांठों (सेट) की रोपाई पंक्तियो में 15 सैं.मी. तथा गांठो से गांठो के बीज 5-8 सैं.मी. की दूरी रखकर रोपाई ऊंची क्यारियों या मेढ़ें बनाकर की जा सकती है| सेट तैयार करने के लिए दिसम्बर महीने में प्याज के बीज की नर्सरी में बीजाई करें तथा मई महीने में नर्सरी से प्याज की छोटी-छोटी गांठे निकाल लें| खेत तैयार करते समय 20 क्विंटल गोबर की गली-सड़ी खाद तथा रोपाई के समय 20 कि.ग्रा. कैन, 40 कि.ग्रा. सिंगल सुपर फास्फेट तथा 8 कि.ग्रा. म्यूरेट आफ पोटाश प्रति बीघा खेतों में डालें| 

  6. इसी महीने गांठ गोभी की सुधरी प्रजातियों पालम टेन्डरनोव, ब्हाईट वियाना तथा परपल वियाना व बन्दगोभी की किस्मों गोल्डन एकड़, प्राईड ऑफ इण्डिया, संकर किस्मों (वरुण, बहार, बजरंग) की पनीरी भी उगाई जा सकती है| 

  7. जुलाई माह में विभिन्न सब्जियों को क्षति पहुँचाने वाले कीटों जैसे पत्ते खाने वाली सुंडियां, फलमक्खी, तना व फल छेदक कीट तथा विभिन्न बिमारियों के प्रति सचेत रहे तथा इनके नियन्त्रण के लिए पहले वर्णन किए गये तरीकों को अपनाएं| इस महीने भिण्डी की फसल में धारीदार भृंग का अधिक प्रकोप होता है| इसे नियन्त्रण करने के लिए 120 ग्राम कार्बेरिल 50 डब्ल्यू.पी.पी. या 90 मि.ली. एण्डोसल्फान 35 ई.सी. प्रति 60 लीटर पानी में घोल कर प्रति बीघा छिड़काव करें| करेले की फसल में पत्ती को छलनी कर देने वाले हट्टा बीटल (कंघी) कीट के नियन्त्रण के लिए भी कार्बोरिल या एण्डोसल्फान का ही इस्तेमाल करें| 

  8. इस समय फूलगोभी की दरम्याना किस्मों (अगेहणी, पूसी, इम्प्रूवड जापानीज, पूसा दीपाली, पालम उपहार) की पनीरी दें| पनीरी उगाने के लिए 3 मीटर लम्बी, एक मीटर चौड़ी तथा 10-15 सैं.मी. ऊंची क्यारी में 20-25 कि.ग्रा. गली-सड़ी गोबर की खाद, 200 ग्रा. सिंगल सुपर फास्फेट, 20-25 ग्रा. एण्डोफिल एम-45 तथा 15-20 ग्रा. थीमेट या फोलीडॉल धूल मिट्टी की ऊपरी सतह में डालने के उपरान्त 5 सैं.मी. की दूरी पर बीज की पतली बीजाई करें| 

  9. बन्दगोभी की तैयार पौधे की खेती में 45x45 सैं.मी. की दूरी पर रोपाई करें| खेत तैयार करते समय 16 क्विंटल गोबर की गली-सड़ी खाद तथा रोपाई के समय 20 कि.ग्रा. कैन, 38 कि.ग्रा. सिंगल सुपर फास्फेट तथा 8 कि.ग्रा. म्यूरेट ऑफ पोटाश प्रति बीघा खेतों में डालें| 

  10. फूल आने पर टमाटर, बैंगन, शिमला मिर्च व लाल मिर्च में नत्रजन की अनुमोदित मात्रा (3-4 कि.ग्रा. यूरिया या 6-8 कि.ग्रा. कैन प्रति बीघा) खेतों में डालें| 

ऊंचे पर्वतीय क्षेत्र :

  1. खेतों में लगी सभी प्रकार की सब्जियों में निराई-गुड़ाई करें तथा नत्रजन (3-4 कि.ग्रा. यूरिया या 6-8 कि.ग्रा. कैन खाद) प्रति बीघा फसलों में डालें| आवश्यकतानुसार 8-10 दिन के अन्तराल पर सिंचाई करें| 

  2. मणडीकरण योग्य पैदावार की सही समय पर तुड़ाई करें तथा साफ़-सुथरी पैदावार की सही ग्रेडिंग तथा पैकिंग करने के उपरान्त ही उसका मणडीकरण करें| 

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Visitor No.: 06339555   Last Updated: 13 Jan 2016