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52 सप्ताह हेतु कृषि कार्यों की रुपरेखा

अक्तूबर(40 से 43 सप्ताह)


  1. धान की फसल पकने के संकेत (पत्ते सूखे एवं भूरे) मिलने की कटाई से 7-10 दिन पहले खेत से पानी निकाल दें| फसल को खेत में पूरा पकने दें ताकि दाने न गिरें| 

  2. सोयाबीन के पत्ते जब पीले पड़ जाएं व गिर जाएं तथा फलियों का रंग बदल जाएं, फसल काट लें| 

  3. कुलथी के पौधे आधे पीले होने व फलियां सूखने पर काट लें| 

  4. सूरजमुखी की गर्म ऋतु की फसल उस समय काटें जब इसके सिर का पिछला भाग पीला पड़ने लगे और फूल के बीच का भाग गहरा भूरा हो जाए| 

  5. गेहूं की अगेती बुआई के लिए एच.एस. 277, वी.एल.616 व एच.पी.डब्ल्यू 184 किस्मों की बुआई करें| एक बीघे के लिए 8 कि.ग्रा. बीज पर्याप्त होता है| सिंचित क्षेत्रों में एक बीघे में 10 कि.ग्रा. यूरिया, 30 कि.ग्रा. एस.एस.पी. व 4 कि.ग्रा. एम.ओ.पी. डालें| असिंचित परिस्थितियों में बीजाई के समय यूरिया, एस.एस.पी. व एम.ओ.पी. क्रमश: 7, 20 व 5 कि.ग्रा./ बीघा डालें| 

  6. गेहूं में आने वाली विभिन्न बिमारियों से बचाव हेतु बीज का बैविस्टीन 50 डब्ल्यू.पी. (2.5 ग्रा. प्रति कि.ग्रा. बीज) से उपचार करें| 

  7. अक्तूबर के अंतिम सप्ताह तक जिन क्षेत्रों में गेहूं की बीजाई करनी है वहां पर दीमक का प्रकोप फसल में अधिक होता है| (विशेष कर असिंचित क्षेत्र) तो बीजाई से पहले बीज का क्लोरपाईरिफॉस 20 ई.सी. (4 मि.ली. प्रति कि.ग्रा. बीज) से उपचार करें या 160 मि.ली. क्लोरपाईरिफॉस 20 ई.सी. को 2 कि.ग्रा. रेत में मिला कर प्रति बीघा बीजाई के समय खेत में डालें| 

  8. निचले, मध्यवर्ती व ऊँचे पर्वतीय शुष्क शितोष्ण खण्ड के निचले क्षेत्रों में जौ की बीजाई का सही समय अक्तूबर का अंतिम सप्ताह है| निचले तथा मध्यवर्ती क्षेत्रों में विमल, सोमु व गोपी किस्में लगाएं| ऊँचे पर्वतीय क्षेत्रों में डोलमा व हरित किस्में लगाएं| यह किस्में मध्यवर्ती क्षेत्रों में भी बोई जा सकती है| 8 कि.ग्रा. बीज/बीघा पर्याप्त होता है| विमल किस्म की बीज मात्रा 6 कि.ग्रा./बीघा रखें| फसल को केरा प्रणाली से 22 सैं.मी. कतारों में बीजें| बीजाई के समय यूरिया या कैन (3.5 या 6.5 कि.ग्रा./बीघा) व एस.एस.पी. (10 कि.ग्रा./बीघा) डालें| बीजाई के समय भूमि में पर्याप्त नमी होनी चाहिए| 

  9. चने (हिमाचल चना-1, सी-235 व एच.पी.जी.-17) की बीजाई मध्य अक्तूबर तक करें| सी- 235 एवं हिमाचल चना-1 के 30 सैं.मी. व एच.पी.जी. -17 को 50 सैं.मी. की दूरी के कतारों में बीजें| बीज 10-12.5 सैं.मी. गहरा डालें| एच.पी.जी. -17 की बीज मात्रा 6.4 व अन्य किस्मों की 3.2 -3.4 कि.ग्रा./बीघा रखें| बीजाई के समय यूरिया या कैन, एस.एस.पी. व एम.ओ.पी. क्रमश: 5 या 10, 30 व 4 कि.ग्रा./बीघा डालें| 

  10. चने में झुलसा रोग से बचाव के लिए एच.पी.जी. 17 व हिमाचल चना -1 लगाएं तथा बीज का डाईथेन एम -45 (2.5 ग्राम प्रति कि.ग्रा. बीज) से उपचार करें| 

  11. मसर (बिपाशा) की बीजाई अक्तूबर अंत में करें| केरा प्रणाली से बीज को 25-30 सैं.मी. की कतारों में बोयें| 2-2.4 कि.ग्रा. बीज प्रति बीघा पर्याप्त होता है| बीजाई के समय यूरिया या कैन (2 या 3 कि.ग्रा./बीघा) व एस.एस.पी. (20 कि.ग्रा./बीघा) डालें| 

  12. सरसों (के.वी.एस.-3 व वी.एस.एच.1) व राया (आर.सी.सी.-4 व वरुणा) की शुद्ध फसल को महीने के पहले पखवाड़े में 2-3 सैं.मी. की गहराई तक 30 सैं.मी.की दूरी की कतारों में केरा या पोरा विधि से बीजें| बीज की मात्रा 500 ग्रा./बीघा पर्याप्त होती है| बीजाई के समय यूरिया या कैन, एस.एस.पी. व एम.ओ.पी. क्रमश: 5 या 10, 20 व 5 कि.ग्रा./बीघा डालें| बीजाई के बाद स्टाम्प 30 ई.सी. (270 मि.ली.) का 60-64 लीटर पानी में प्रति बीघा छिड़काव करें| 

  13. गोभी सरसों (नीलम व शीतल) की बीजाई भी अक्तूबर के पहले पखवाड़े में करें| बीज की मात्रा 500 ग्राम. /बीघा व अन्तर 30 X 40 सैं.मी. का रखें| यूरिया या कैन, एस.एस.पी. व एम.ओ.पी. क्रमश: 10 या 20, 30 व 5 कि.ग्रा./ बीघा डालें| बीजाई के बाद 30 ई.सी. ( 270 मि.ली./बीघा) का छिड़काव करें| 

  14. कांगड़ा एवं मंडी जिले में अलसी (सुरभी, नगरकोट, जीवन, जानकी, व हिमालिनी) की बीजाई प्रथम पखवाड़े में 4-5 सैं.मी. गहरा केरा विधी से बोयें| 3.2 कि.ग्रा. बीज प्रति बीघा पर्याप्त होता है| लेकिन खड़ी धान की फसल में बीज की मात्रा 6 कि.ग्रा./बीघा रखें| बीजाई के समय 4.5 कि.ग्रा. यूरिया या 8 20 कि.ग्रा. एस.एस.पी. एवं 2.8 कि.ग्रा. एम.ओ.पी. प्रति बीघा डालें| टेरा प्रणाली से बोई आलसी में यूरिया या कैन की मात्रा 20 प्रतिशत बढ़ा लें| 

  15. तोरिया की फसल 3 सप्ताह की होने पर घने पौधों को निकाले ताकि पौधों की परस्पर दूरी 10-15 सैं.मी. रह जाए| खरपतवार नियन्त्रण के लिए निराई-गुड़ाई करें| 

  16. शुष्क शीतोष्ण क्षेत्रों में रागी, राजमाश, चोलाई इत्यादि की फसल अक्तूबर के प्रथम सप्ताह में तैयार हो जाती है| पौधों को जमीन के पास से काटें| 

  17. लाहौल एवं किन्नौर में सर्दियां पड़ने से पहले अक्तूबर के दूसरे पखवाड़े में कुठ की बीजाई कर लें| 2.6 कि.ग्रा. बीज प्रति बीघा 3-4 सैं.मी. गहराई तक 25 सैं.मी. की कतारों में बीजें| 

चारे की फसलें


  1. जई की बीजाई हेतु पूरा महीना उत्तम है| 

  2. निचले, मध्यवर्ती व ऊँचे पर्वतीय क्षेत्रों में रिजका की सिरसा -9 व आनंद-3 किस्में बीजें| अम्लीय भूमि में बीजाई से लगभग 3-4 सप्ताह पहले चूना मिलाए| बीजाई के समय यूरिया 4.4 कि.ग्रा. व एस.एस.पी. 30 कि.ग्रा. प्रति बीघा डालें| 12 कि.ग्रा. बीज प्रति बीघा पर्याप्त होता है| बीज की बीजाई से पहले रातभर भिगो कर बीजें| पंक्तियों की परस्पर दूरी 40 सैं.मी. रखें| 

  3. समशीतोष्ण क्षेत्रों में (खण्ड 4) रेड क्लोबर (पालमपुर कम्पोजिट, पी.आर.सी. 3), व्हाईट क्लोवर (पालमपुर कम्पोजिट), फेस्क्यू (हिमा -4 व हिमा-1), आरचार्ड ग्रास (कोमेट, सुमैक्स), कैनरी ग्रास (कामन कैनरी ग्रास) व तिमोथी (क्लेयर, इयोग्ये) की बीजाई करें| बीजाई के समय व्हाईट व रेड क्लोवर में 4.4 कि.ग्रा. यूरिया व 30 कि.ग्रा. एस.एस.पी. प्रति बीघा डालें| फेस्क्यू, आरचार्ड ग्रास, कैनरी ग्रास व तिमोयी में यूरिया व एस.एस.पी. क्रमश: 7 व 20 कि.ग्रा./बीघा डालें| 

  4. आरचार्ड ग्रास+ रैड क्लोवर की मिश्रित खेती के लिए रैड क्लोवर की बीजाई आरचार्ड ग्रास की दो कतारों के बीच में करें| 

सब्जियां

निचले पर्वतीय क्षेत्र

  1. अक्तूबर महीने के प्रथम पखवाड़े किसान मटर की अगेती किस्में (अरकल,मटर,अगेता,बी.एल.7) की बीजाई पंक्तियों में 30 सैं.मी. तथा 7-10 सैं.मी. पौधों से पौधों की दूरी पर कर सकते हैं| 

  2. फूलगोभी,बंदगोभी,गांठ गोभी एवं ब्राकली की तैयार पौध की रोपाई 60 सैं.मी.पंक्तियों से पंक्तियों की दूरी पर तथा 45 सैं.मी. पौधों से पौधों की दूरी पर की जा सकती है| खेत तैयार करते समय 20 क्विंटल गोबर की गली सड़ी खाद तथा रोपाई के समय 20 कि.ग्रा. कैन, 38 कि.ग्रा. सिंगल सुपर फास्फेट तथा 10 कि.ग्रा. म्यूरेट आफॅ पोटाश प्रति बीघा खेतों में डालें| शेष कैन की 20 कि.ग्रा. मात्रा दो बराबर हिस्सों में एक निराई-गुड़ाई के समय तथा दूसरी फूल बनने के समय फसलों में डालें| खरपतवार नियंत्रण के लिए लासो (एलाक्लोर)240 मि.ली. प्रति 60 ली. पानी प्रति बीघा के घोल का रोपाई के 2 दिन पूर्व तैयार खेतों में छिड़काव करें| 

  3. चाईनीज़ बंदगोभी की तैयार पौध की रोपाई पक्तियों में 45 सैं.मी. तथा 30 सैं.मी. पौधों से पौधों की दूरी पर करें| खेत तैयार करते समय 20 क्विंटल गोबर की गली सड़ी खाद तथा रोपाई के समय 16 कि.ग्रा. कैन, 38 कि.ग्रा सिंगल सुपर फस्फेट तथा 7 कि.ग्रा. म्यूरेट आफ पोटाश प्रति बीघा खेतों में डालें| 

  4. गोभी की पनीरी में कमर तोड़ व जड़गलन रोग होने पर क्यारियों को डाईथेन एम 45 (25 ग्रा. प्रति लीटर पानी) तथा बैवस्टीन (5 ग्रा.प्रति लीटर पानी) के घोल से सींचे| 

  5. जड़दार सब्जियों जैसे मूली (जापानीज़ व्हाईट, चाईनीज़ पिंक, मीनो अली), शलजम (पी.टी,डब्ल्यू.जी) गाजर (पूसा केसर, पूसा यमदागि्न, नान्तीज, चन्तनी) तथा पत्तेदार सब्जियों जैसे पालक (पूसा हरित, आल ग्रीन,पूसा भारती) तथा मेथी (कसूरी, आई.सी. 74) की बीजाई पक्तियों में 25-30 सैं.मी.की दूरी पर करें| 

  6. लहसुन की सुधरी किस्मों (जी.एच.सी, एग्रिफांऊड पार्वती) की सीधी बिजाई पंक्तियों में 20 सैं.मी. व पौधों में 10 सैं.मी. की दूरी पर करें| खेत तैयार करते समय 10 क्विंटल गोबर की गली सड़ी खाद तथा बीजाई के समय 20 कि.ग्रा. कैन, 38 कि.ग्रा. सिंगल सुपर फास्फेट तथा 8 कि.ग्रा. म्यूरेट आफ पोटाश प्रति बीघा खेतों में डालें| 

  7. प्याज़ के स्वस्थ बीजोत्पादन के लिए सुधरी किस्मों (पटना रैड, नासिक रैड, ए.एफ.एल.आर, ए.एफ.डी.आर) की रोग रहित तथा पतली गर्दन वाले कन्दों की रोपाई 45 सैं.मी. पंक्तियों तथा 30-45 सैं.मी. कन्दों से कन्दों की दूरी पर करें| खेत तैयार करते समय 8-10 क्विंटल गली सड़ी गोबर की खाद तथा रोपाई के समय 12 कि.ग्रा. कैन, 25 कि.ग्रा. सिंगल सुपर फास्फेट तथा 7 कि.ग्रा. म्यूरेट ऑफ पोटाश प्रति बीघा खेतों में डालें| शेष कैन की आधी मात्रा दो बराबर हिस्सों में एक (6 कि.ग्रा. कैन) निराई-गुड़ाई के समय तथा दूसरी मात्रा (6 कि.ग्रा. कैन) फूल निकलते समय फसल में डालें| शुद्ध प्रजाति के बीज उत्पादन हेतू दो प्रजातियों के बीज 800-1000 मीटर पृथकीकरण दूरी रखें| 

मध्य पर्वतीय क्षेत्र :

  1. लसहुन की सुधरी प्रजातियों (जी.एच.सी एग्रिफाऊँड पार्वती) की बिजाई पक्तियों में 20 सैं.मी. व पौधों में 10 सैं.मी. की दूरी पर करें| 

  2. इसी प्रकार फूलगोभी,बंदगोभी,ब्राकली, चाईनीज़ बंदगोभी की तैयार पौध की रोपाई 60-45 सैं.मी. की दूरी पर की जा सकती है| 

  3. जड़दार सब्जियों जैसे मूली (मीनो अर्ली, जापानीज़ व्हाईट) गाजर (नान्तीज, चान्तनी), शलजम(पी.टी डब्ल्यू.जी) तथा पत्तेदार सब्जियों जैसे पालक (पूसा हरित, आल ग्रीन, पूसा भारती), मेथी (आई.सी 74 कसूरी) की बीजाई पक्तियों में 25-30 सैं.मी. की दूरी पर करें| 

  4. खेतों में लगी हुई सभी प्रकार की सब्जियों में निराई-गुड़ाई करें तथा नत्रजन की अनुमोदित मात्रा (3-4 कि.ग्रा. यूरिया या 6-8 कि.ग्रा. कैन प्रति बीघा) फसलों में डालें| 

  5. इसी महीने गोभी वर्गीय सब्जियों जैसे फूलगोभी, ब्राकली, इत्यादि की पनीरी भी उगाई जा सकती है| 

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