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52 सप्ताह हेतु कृषि कार्यों की रुपरेखा

दिसम्बर (48 से 52 सप्ताह)


  1. गेहूं की बुआई के लिए एच.पी.डब्ल्यु.-42 व.एच.एस.-295 किस्में लगाएं| खण्ड-1 के सिंचित क्षेत्रों के लिए पी.बी.डब्ल्यु- 373, यू.पी. 2338, राजस्थान-3765 व यु.पी.–2425 अन्य उपयुक्त किस्में है| 

  2. समय में बीजी गेहूं फसल में मूसल जड़ें निकलने की अवस्था में यूरिया या कैन (10 या 19 कि.ग्रा./बीघा, सिंचित, 7 या 12.5 कि.ग्रा/बीघा, असिंचित) छिटकें| 

  3. खरपतवार नियन्त्रण के लिए गेहूं में आइसोप्रोटयूरान या मैटोक्सुरान का प्रयोग करें| जब खरपतवार पौधों की 2-3 पंक्तियां हो| यदि घास व चौड़ी पत्तियों वाले दोनों खरपतवारों की समस्या हो तो आइसोप्रोटयुरॉन (75 प्रतिशत) 110 ग्रा./बीघा + 2,4 –डी (सोडियम) 50 ग्राम/बीघा के मिश्रण को फसल में 30-35 दिनों के बाद छिड़काव करें| 

  4. गेहूं की पछेती बुआई यदि चील की पंक्तियां या अन्य किस्म की पत्तियों को 6.4 क्विंटल/बीघा खेत में बिछा दें तो फसल जल्दी उगती है| 

  5. असिंचित क्षेत्रों में बीजाई के लिए बीज की मात्रा 20-25 प्रतिशत अधिक डालें| जौ की खड़ी फसल में बीजाई के 4-5 सप्ताह बाद 3.5 कि.ग्रा. यूरिया या 6.5 कि.ग्रा. कैन की दूसरी मात्रा छिटकें| खरपतवार की 3-4 पत्तियों की अवस्था आइसोप्रोटकयुरॉन (75 प्रतिशत) 80 ग्रा. को 60-64 लीटर पानी में घोलकर प्रति बीघा छिड़काव करें| चौड़े पत्ते वाले खरपतवारों के 30-35 दिन के बाद प्रयोग करें| 

  6. गोभी सरसों में यूरिया (5 कि.ग्रा/बीघा) या कैन (10 कि.ग्रा./बीघा) की दूसरी मात्रा में डालें| 

  7. यदि खण्ड- 2 मुख्यतः कुल्लु घाटी में सर्दियों की वर्षा आने में बहुत देरी हो जाए तो गेहूं (किस्म अराधना) और गोभी, सरसों की बीजाई करें| 

  8. तोरिया की फलियां जब पीली हो जाएं तब फसल को काट लें| 

  9. जई की फसल यदि पहले नहीं बीजी हो तो दिसम्बर 15 तक बीजें| 

सब्जियां

निचले पर्वतीय क्षेत्र

  1. मूली की सुधरी प्रजाति पूसा हिमानी की सीधी बीजाई प्रदेश के निचले पर्वतीय क्षेत्रों में इसी समय की जा सकती है| बीजाई कतारों में 25-30 सैं.मी. की दूरी पर करें| खेत तैयार करते समय 8 क्विंटल गोबर की गली-सड़ी खाद तथा बीजाई के समय 16 कि.ग्रा. कैन, 25 कि.ग्रा. सिंगल सुपर फास्फेट तथा 5 कि.ग्रा. म्यूरेट ऑफ पोटाश प्रति बीघा डालें| शेष कैन (16 कि.ग्रा.) की आधी मात्रा दो बराबर हिस्सों में, एक मिट्टी चढ़ाते समय तथा दूसरी इसके एक महीने के उपरान्त खड़ी फसल में डालें|

  2. फूलगोभी, बन्दगोभी, ब्रॉकली तथा गांठगोभी में निराई-गुड़ाई करें तथा नत्रजन खाद (3-4 कि.ग्रा. यूरिया या 6-8 कि.ग्रा. कैन प्रति बीघा) गुड़ाई के समय फसलों में डालें| 

  3. फूलगोभी एवं बन्दगोभी में तेले की रोकथाम के लिए 60 मि.ली. मैथालियान 50 ई.सी. प्रति 60 लीटर प्रति बीघा की दर से छिड़काव करें तथा सरसों में तेले के लिए 60 मि.ली. मिथाइल डेमीटान 25 ई.सी. प्रति 60 लीटर पानी में प्रति बीघा के हिसाब से छिड़काव करें (साग वाली सरसों में छिड़काव न करें| 

  4. गोभी वर्गीय सब्जियों में डाऊनी तथा फूल सड़न रोग की रोकथाम के लिए डाईथेन एम-45 (25 ग्रा. प्रति 10 लीटर पानी) तथा बैविस्टीन (10 ग्रा. प्रति 10 लीटर पानी) के घोल का 10-15 दिनों के अंतराल पर दो बार छिड़काव करें| 

  5. लहसुन की फसल में भी निराई-गुड़ाई करें तथा नत्रजन खाद (3-4 कि.ग्रा. यूरिया या 6-8 कि.ग्रा. कैन खाद प्रति बीघा) फसल में डालें| 

  6. दूसरे पखवाड़े में प्याज की तैयार पौधे की रोपाई पंक्तियों में 15 सैं.मी. तथा पौधों में 10 सैं.मी. की दूरी पर करें| खेत तैयार करते समय 20 क्विंटल गोबर की गली-सड़ी खाद तथा रोपाई के समय 20 कि.ग्रा. कैन, 40 कि.ग्रा. सिंगल सुपर फास्फेट तथा 8 कि.ग्रा. म्यूरेट ऑफ पोटाश प्रति बीघा खेतों में डालें| शेष कैन (20 कि.ग्रा.) की आधी-आधी मात्रा दो बराबर हिस्सों में रोपाई के बाद 30-45 दिन के अन्तराल पर दो बार फसल में डालें| 

  7. आलू की बीजाई के लिए सुधरी किस्मों जैसे कुफरी ज्योति, कुफरी गिरिराज, कुफरी चन्द्रमुखी इत्यादि का ही चयन करें| बीज के लिए स्वस्थ, साबुत या कटे हुए कन्द (वजन 30 ग्राम) जिनमें कम से कम 2 आंखें हो का प्रयोग करें| बीजाई से पहले कन्दों को इण्डोफिल एम. 45 (25 ग्रा. प्रति 10 लीटर पानी) के घोल में आधे घण्टे तक उपचार करने के उपरान्त छाया में सुखाकर बीजाई करें| आलू की बीजाई अच्छी तरह से तैयार खेत में 15-20 सैं.मी. आलू से आलू तथा 45-60 सैं.मी. पंक्तियों से पंक्तियों की दूरी पर नालियां बनाकर की जा सकती है| अच्छी तरह से तैयार खेत में उचित दूरी पर नालियां बनाएं तथा उनमे 10 कि.ग्रा. यूरिया या 20 कि.ग्रा. कैन, 40 कि.ग्रा. सिंगल सुपर फास्फेट तथा 8 कि.ग्रा. म्यूरेट ऑफ पोटाश प्रति बीघा खादों का मिश्रण डालें| गोबर की अच्छी गली-सड़ी खाद लगभग 20 क्विंटल प्रति बीघा नालियों में डालकर इसके ऊपर बीज आलू लगाएं| इसके उपरान्त नालियों का आधा या पूरा मिट्टी से ढक दें| 

  8. आलू की बीजाई करने से पूर्व ध्यान रखें कि जिन क्षेत्रों में आलूओं को सफेद सुंडी, कटुआ, कीट व वाइर वर्ग जैसे भूमि में पाये जाने वाले कीट क्षति पहुंचाते हो वहां पर बीजाई से पहले खेत में 2 कि.ग्रा. फॉरेट 10 जी. या 2 कि.ग्रा. क्वीनलफॉस 5 जी. प्रति बीघा की दर से डालें|
  9. मटर की जल्दी बीजाई की गई फसल में चूर्णसिता रोग के नियन्त्रण के लिए कैराथेन (5 मि.ली. प्रति 10 लीटर पानी) का छिड़काव करें| 


मध्य पर्वतीय क्षेत्र:

  1. प्याज की तैयार पौधे की रोपाई 15-20 सैं.मी. कतारों में तथा 5-7 सैं.मी. पौधों से पौधों की दूरी पर करें| 

  2. आलू की बीजाई के लिए सुधरी किस्मों कुफरी ज्योति, कुफरी गिरिराज, कुफरी, चन्द्रमुखी इत्यादि का ही चयन करें| बीज के लिए स्वस्थ, साबुत या काटे हुए कन्द (वजन 30 ग्रा.) जिनमे कम से कम दो आंखें हों, का प्रयोग करें| 

  3. खेतों में लगी सभी प्रकार की सब्जियों में निराई-गुड़ाई करें तथा नत्रजन की मात्रा (3-4 कि.ग्रा. यूरिया या 6-8 कि.ग्रा. कैन प्रति बीघा) फसलों में डालें| 

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