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मटर

हरा मटर हिमाचल प्रदेश की एक प्रमुख बेमौसमी सब्ज़ी है। व्यावसायिक रूप से इसे सर्दियो में मध्यवर्ती व निचले क्षेत्रों में और गर्मियों में ऊंचे पर्वतीय व आर्द्र शीतोष्ण वाले क्षेत्रों में उगाया जाता है। गर्मियों में पर्वतीय क्षेत्रो का वातावरण मटर की फसल के लिए अनुकूल होने के कारण इस क्षेत्रा के किसानों की आय में पर्याप्त वृद्वि होती है। मैदानी क्षेत्रों में अध्कि गर्मी होने के कारण इसका उत्पादन नहीं हो पाता। पर्वतीय क्षेत्रों के मटर अपनी विशेष सुगन्ध्, मिठास व ताजगी के लिए सभी को आकर्षित करते हंै। प्रदेश में लगभग 8000 हैक्टेयर क्षेत्रा से 80,000 मीट्रिक टन उत्पादन होता है। 

उन्न्त किस्में :



(अ) अगेती किस्में:


अरकल: बौनी, झुरींदार बीज गहरे हरे रंग व सभी क्षेत्रों के लिए उपयुक्त किस्म, 8-9 दानों वाली अन्दर को मुड़ी हुई फलियां, अध्कि उपज के लिए बीजाई सितम्बर के पहले पखवाड़े में करनी चाहिए। औसत पैदावार 50-60 क्विंटल प्रति हैक्टेयर। वी. एल. 7: बौनी झुरीदार, बीज, हल्के हरे रंग व 6-8 दानों वाली फलियां। औसत उपज 50-60 किंवटल प्रति हैक्टेयर ।

मटर अगेता: बौनी किस्म, अरकल से 7 दिन पहले तैयार होती है तथा 10-15 प्रतिशत अध्कि उपज देती है। बीज उगाने की बढि़या क्षमता (100 प्रतिशत) व प्रदेश के क्षेत्रा-1 तथा क्षेत्रा-2 के लिए उपयुक्त ।

मुख्य मौसम की किस्में:



पंजाब-89 : यह किस्म अध्कि पैदावार देने वाली लम्बी, और आकर्षक चमकदार हरी फलियों वाली (10-12 सै. मी.) लम्बी और प्रत्येक कली में 9-12 दाने होते है। यह मध्यम तैयार होने वाली मीठे दानों वाली किस्म है। पहली दो तुड़ाईयों में लगभग 75 प्रतिशत फसल मिल जाती है तथा इस किस्म की औसत पैदावार 135 किंवटल प्रति हैक्टेयर है जो कि वी.एल.03, अजा़द पी-1 और पालम प्रिया से अध्कि है ।

(ब) मुख्य मौसम की किस्में:



पालम प्रिया (डी. पी. पी. 68) अध्कि पैदावार देने वाली प्रजाति व चूणर्सिता रोग के लिए प्रतिरोधी, सभी क्षेत्रों के लिए उपयुक्त किस्म है इसकी पैदावार 120-130 क्विंटल प्रति हैक्टेयर है|

बोनविला: मध्यम ऊंचाई, झुरीदार बीज, सभी क्षेत्रों के लिए उपयुक्त किस्म, हल्के हरे रंग व 7-8 दानों वाली फलियां। औसत पैदावार 100-125 क्विंटल प्रति हैक्टेयर ।

वी. एल.-3 : मध्यम ऊंचाई, झुरीदार बीज, निचले तथा मध्यवर्ती क्षेत्रों के लिए उपयुक्त किस्म, 7-8 दानो वाली हरी फलियां। औसत पैदावार 140-150 क्विंटल 

किन्नौरी: लम्बे पौधे, गोल बीज, ऊंचे पर्वतीय क्षेत्रों के लिए उपयुक्त किस्म, हल्के हरे रंग की 5-6 दोनो वाली फलियां। औसत पैदावार 100-125 क्विंटल प्रति हैक्टेयर।

सोलन निरोग: फलियां 8-10 सैं. मी. लम्बी व 8-9 दानें वाली और 90-95 दिनों मंे तैयार, चूर्णसिता रोग के लिए प्रतिरोध्ी व उत्पादन 130-140 क्विंटल/हैक्टेयर । प्रदेश के क्षेत्रा-2 व क्षेत्रा-3 के लिए उपयुक्त ।

जी. सी. 477: मध्य ऊंचाई वाली किस्म, बीज हरे और झुरींदार फलियां गहरी हरी, थोड़ी, मुड़ी हुई, 7-8 बीजों वाली तथा मिठास वाली, 110-120 दिनों में पहली तुड़ाई, चूर्ण रोग के लिए संवेदनशील परन्तु एस्कोकाईटा तथा जीवाणु झुलसा से कम प्रभावित, औसत पैदावार 110-120 क्विंटल/हैक्टेयर, क्षेत्र-2 के लिए उपयुक्त किस्म ।

निवेश सामग्री


  प्रति हेक्टर प्रति बीघा प्रति कनाल
अगेती किस्में(बीज )(किलो ग्राम) 120-130 10 5
मुख्य किस्में (बीज )(किलो ग्राम) 60-75 5-6 2.5-3
गोबर की खाद (क्विंटल ) 200 16 8
विधि -1
यूरिया ( किलो ग्राम) 100 8 4
सुपरफास्फेट ( किलो ग्राम ) 375 30 15
म्यूरेट ऑफ़ पोटाश (किलो ग्राम) 100 8 4
विधि- 2
12.32.16 मिश्रित खाद (किलो ग्राम ) 187.5 15 7.5
म्यूरेट ऑफ़ पोटाश (किलो ग्राम) 50 4 2
यूरिया ( किलो ग्राम) 5 0.4 0.2
स्टाम्प 3 250 मि.ली . 125 मि.ली .
या
लासो लीटर 3 240 मि.ली . 120 मि.ली .
या
बासालिन लीटर 2.5 200 मि.ली . 100 मि.ली .
या
(सैटरन) लीटर 4 250 मि.ली . 125 मि.ली .

सस्य क्रि याये:


विधि 1: गोबर की खाद भूमि तैयार करते समय ही मिट्टी में मिला दें। यूरिया, सुपर फाॅस्फेट तथा म्यूरेट आॅफ पोटाश की पूरी मात्रा बीजाई के समय खेत में डाल दें।

विधि 2: गोबर की खाद, 12ः32ः16 मिश्रित खाद, म्यूरेट आॅफ पोटाश व यूरिया खाद की सारी मात्रा बिजाई के समय खेत में डाल दें।

बीजाई: मटर के बीज सीधे खेत में समतल क्यारियों में इस अन्तर पर बीजे:
शीघ्र तैयार होने वाली किस्में 30*5 सै.मी.
लम्बे समय (मुख्य) पर तैयार होने वाली किस्में 45-60*10 सै. मी.

 

बीजाई का समय:

  अगेती किस्म मुख्य फसल
निचले पर्वतीय क्षेत्र: सितम्बर-अक्तूबर नवम्बर
मध्य पर्वतीय क्षेत्र सितम्बर (पहला पखवाड़ा) नवम्बर,
ऊचे पर्वतीय क्षेत्र मार्च-जून अक्तूबर-नवम्बर, मार्च-जून

जल प्रबन्ध्:

बीजाई से पहले एक सिंचाई करना आवश्यक है जिससे भूमि में बीज अंकुरण के लिए पर्याप्त नमी हो जाए। अच्छी फसल लेने के लिए 10-12 दिन के अन्तर पर सिंचाई करनी चाहिए।

निराई-गुड़ाई व खरपतवार नियंत्रण:


फसल में 1-2 बार निराई-गुड़ाई की आवश्यकता होती है जोकि फसल की किस्म पर निर्भर करती है। पहली जब पौधें मे 3-4 पत्ते हों या बीजाई के 3-4 सप्ताह बाद करें और दूसरी फूल आने से पहले करें। वार्षिक घास वाले और चैड़ी पत्तों वाले खरपतावारों की रोकथाम के लिए बीजाई के 2 दिन के अन्दर एलाक्लोर (लासो) 1.5 कि. ग्रा. (स. प्र.) या थायोबेनकार्ब (सैटरन)1.5 कि. ग्रा. (स. प.) या पैन्डीमिथालिन (स्टाम्प) 1.0 कि. ग्रा. (स.प.) या फलूक्लोरालिन (बैसालिन) 1.0 लीटर ग्रा. (स. प.) को 750-850 लीटर पानी में घोलकर प्रति हैक्टेयर छिड़काव करें।

तुड़ाई व उपज:

 

मंडी मे अच्छी कीमत के लिए फलियों का समय पर तोड़ना अनिवार्य है अन्यथा इनके गुण पर प्रभाव पडे़गा। बिक्री अवस्था में फलियां पूर्णतयः भर जाती है। इसके पश्चात हरा रंग घटने लग जाता है। सामान्यतः 7-10 दिन के अन्तर पर 4-5 बार फलियों की तुड़ाई की जाती है।

अच्छी फसल से निम्नलिखित औसत उपज होती है:

 

  प्रति हेक्टर प्रति बीघा प्रति कनाल
अगेती फसल (क्विंटल ) 60-85 5-7 2.5-3.5
मुख्य मोसम फसल क्विंटल 100-150 8-12 4-6

 

बीजोत्पादन:

मटर की फसल स्वपरागित है इसलिए इसकी विभिन्न किस्मो का बीज पास के खेतो मे बिना बाहिरी परागण के खतरे से किया जा सकता है फिर भी प्रमाणित बीज के लिए 10 मीटर का अन्तर मिश्रण से बचने के लिए अनिवार्य है रागे ग्रसित आरै दूसरी किस्मो के पोधो को जो कि अवाछंनीय है फसल की विभिन्न अवस्थाआ मे जसै वनस्पति,फूल आने पर तथा फलियाँ बनने पर निकालते रहे फसल की पूरी अवधी खेतो मे नमी चाहिए। पकने पर प पीले पडऩे लगते हैं तब उन्हे उखाड़ कर अच्छी तरह सुखा ले आरै फिर बीज निकाले बीज को साफ करके सुखाकर बन्द डिब्बा मे रखे कीड़ो से बचाव के लिए बीज की मात्रा के अनसुार डिब्बा मे सले फासॅ की गोलिया अवश्य डाले बीजाई से पहले फफूंद नाशको से बीज उपचार अवश्य करे ताकि बीज जनक व्याध्यिाे से बचाव हो सके ।

बीज उपज:


प्रति हेक्टर प्रतिबीघा प्रतिकनाल
10-15 80-120 40-60

 

पोध संरक्षण

 

लक्षण उपचार
बीमारिया  
चूर्णलासिता रोग: पौधे के सभी भागों पर सफद हल्के रंग के ध्ब्बे पड़ जाते है।

1. रोग के लक्षण देखते ही कैराथेन (5 मि. ली.) या वैटेबल सल्फर (20 ग्राम) या बैविस्टीन (5 ग्राम) या वेकार (5 ग्राम) या बैलिटान (5 ग्राम) का 10 लीटर पानी में छिड़काव करें। यदि आवश्यक हो तो 10-15 दिन के बाद पुनः छिड़काव करें।
2. टेबूकानोजोल (0.04 5% )या सितारा (0.05%) या कान्टाफ (0.05%)या हैक्साकोनाजोल 5 ई सी का 15-20 दिन के अन्तराल पर या शेयर (0.4%)का 10 दिन के अन्तराल पर छिड़काव करें।

 

एस्कोकाईटा/माईकोसफैरिला ब्लाईटः प्रभावित पौधे मुरझा जाते हैं। जडो भूरी हो जाती हंै। पत्तों और तनों पर भूरे ध्ब्बे पड़ जाते है। इस बीमारी से फसल कमजोर पड़ जाती है |

1. मोटे और स्वस्थ बीज का प्रयोग करें।
2. बीज को बैविस्टीन (2.5 ग्रा./कि.ग्रा.) से उपचार करें।
3. रोग ग्रसित पौधें को नष्ट कर दें।
4. हल्की सिंचाई दें व जल निकासी का उचित प्रबन्ध् करें।
5. फूल आने पर फसल में बैविस्टीन 50 डब्लयू पी (10 ग्रा./10 लीटर पानी) या मैनकोजैब 75 डब्ल्यू पी (25 ग्राम/10 लीटर पानी) में 10-15 दिन के अन्तर पर 4-5 छिड़काव करें।

 

विल्ट: जड़े सड़ जाती हं| तथा पौधे पीले होकर मुरझा जाते हैं।

1. बीज को बैविस्टीन (5ग्रा./10 लीटर पानी) से उपचार करने के बाद बोएं।
2. अंक्रामित क्षेत्र में तीन वर्षीय फसल चक्र अपनायंे ।

 

भूरा रोगा : पत्तों, तनों तथा फलियों पर भूरे रंग के ध्ब्बे बन जाते हैं।

1. फसल को हैक्साकोनोजोल 5 ई. सी. (कान्टाफ) या टील्ट 25 ई सी या फोलीकुर 250 ई डब्ल्यू 0.1% या वायकाॅर (0.05%) या स्कोर (0.05) या इण्डोफिल एम-45 0.25%$बैवस्टिीन 0.1ःका छिड़काव करें तथा आवश्यकतानुसार 15 दिन के अन्तराल पर दोबारा छिड़काव किया जा सकता है।

 

बैक्टीरियल ब्लाईट : भूरे रंग के पनीले ध्ब्बे तने, शाखाओं के जोड़ो, फलियों तथा पत्तियों के किनारों पर पड़ जाते हंै। रोग के अगेते प्रकोप से पौध्े पूरी तरह मुरझा जाते हैं।

1. स्वस्थ बीज का प्रयोग करें और प्रदेश के गर्म स्थानों में तैयार बीज का प्रयोग करें।
2. बीज का स्ट्रैप्टोसाईकलिन के घोल (100 पी. पी. एम.)में 2 घण्टे तक शोध्ति करें ।
3. बाद में इसी रसायन (1 ग्रा/10 लीटर पानी) का घोल छिड़के। यदि आवश्यक हो तो 7 दिन बाद फिर छिड़काव करें।
4. रोगग्रस्त भागों को एकत्रा करके जला दें
5. तीन वर्षीय फसल चक्र अपनायंे ।
6. जल निकासी का उचित प्रबन्ध् करें और फसल की सिंचाई करें।
7. नवम्बर के दूसरे पखवाड़े में बीजी गई फसल पर बीमारी का कम प्रकोप होता है।

 

कीटः  
लीफ माईनर(पर्णखनिक) और थ्रिप्स : लार्वे पत्तों पर सुरंग बनाते हैं तथा फरवरी से अप्रैल तक हानि पहुचाते हैं। प्रौढ़ थ्रिप्स फूल के अन्दर पलते हैं तथा शिशु पत्तों और फलियों पर पलते हैं।

लैम्बड़ा- साईहेलोथ्रीन 0.04 प्रतिशत (80 मि. ली. कराटे 5 प्रतिशत) या साईपरमैथरीन 0.0075 प्रतिशत (75मि. ली. ई. सी. या डाईक्लोरवास 0.04 प्रतिशत (50 मि. ली. न्यूवान 76 ई. सी.) या फैनिट्राथियान 0.05 प्रतिशत (100 मि.ली.- सुमिथियान/ फोलिथियाॅन/एकोथियान 50 ई. सी.) को 100 लीटर पानी में घोलकर फसल पर जिस समय भी कीड़ों का प्रकोप दिखाई दे, छिड़काव करें। मोनोक्रोटोफाॅस 0.036 प्रतिशत (मोनोसिल/ मिलफाॅस/मोनोक्रोटोफाॅस 36 एस एल या मिथाईल 100 मि. ली. को 100 लीटर या मिथाईल डेमीटान 0.025 प्रतिशत (मैटासिटाॅक्स 25 ई. सी 100 मि. ली.) को 100 लीटर पानी में मिलाकर छिड़काव करें। इसका फरवरी-मार्च मे प्रकोप होता है। जब फलियां पकने लगे तो फलियों के तुड़ान के बाद इसी दवाई का छिड़काव करें और 15 दिन तक फलियां न तोड़े ।
नोट दवाई का छिडक़ाव उस समय करे जब 40 % या इससे अध्कि पक्रापे हो

 

फली छेदक: सुंडियां पत्तों पर पलती है और बाद में फलियां में घुसकर बीज खाती हैं। कार्बरिल (1.5 कि. ग्रा. सेविन 50 डब्ल्यू पी)या एंडोसल्फान (1 लीटर थायोडान/ एण्डोसिल/हिलडान 35 ई. सी.) को 750 लीटर पानी में घोल कर प्रति हैक्टेयर छिड़काव करें।
सावधानी : छिड़काव से 15 दिन बाद ही फलियाँ तोड़े ।

 

नोट: लीफ माईनर ;पर्णखनिकद्ध और चूर्णलासिता के नियन्त्राण के लिए एकीकृत छिड़काव सारिणी :

फरवरी के दूसरे सप्ताह तक या फूल आने से 15 दिन पहले फसल पर मिथाईल डैमीटान 0.025 प्रतिशत (100 मि. ली. मैटासिस्टाक्स 25 ई. सी) प्रति 100 लीटर पानी या मोनोक्रोटोफास 0.036 प्रतिशत (100 मि. ली. मोनोसिल/मिलफास/ मोनोक्रोटोफास 36 एस. एल.द) 100 लीटर पानी्) या मैटासिस्टाक्स 25 ई. सी. (100 मिली लीटर प्रति 100 लीटर पानी) रूवीगान 12 ई. सी (40 मि. ली. प्रति 100 लीटर पानी)का छिड़काव 14 दिनों के अन्तराल पर करें।

 

या

 

फरवरी के अंतिम सप्ताह में तथा इसके 14 दिन बाद एक और छिड़काव बैलेटान 0.05 प्रतिशत (50 ग्राम/100 लीटर पानी )मिथाईल डेमीटान 0.02 प्रतिशत (मैटासिस्टाॅक्सद्ध 100 मि. ली./100 लीटर पानी) या काॅन्टाॅफ 0.05 प्रतिशत ;50 ग्राम/100 लीटर पानीद्ध$मिथाईल डेमीटान (मैटासिस्टाक्स 100 मि. ली. /100 लीटर पानी) या काॅन्टाफ 0.05 प्रतिशत (50 ग्राम/100 लीटर पानी) या डाईक्लोरवास (65 मि. ली. न्यूवान या मासबान 76 ई. सी. /100 लीटर पानी) या टोपाज .05 प्रतिशत$मिथाईल डेमीटान 0.025 प्रतिशत (100 मि. ली. मैटासिस्टाॅक्स 25 ई. सी/100 लीटर पानी) का छिड़काव करें।

 

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