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हरितगृह में सब्जी उत्पादन

1. शिमला मिर्च उत्पादन:

हिमाचल प्रदेश के मध्यवर्ती क्षेत्रों में पालीहाऊस तकनीक द्वारा वर्ष भर शिमला मिर्च का उत्पादन किया जा सकता है। इस तकनीक द्वारा उगाई गई शिमला मिर्च की गुणवता बहुत अच्छी होती है तथा मण्डियों में भी अच्छे दाम मिलते हैं। इसलिए यह तकनीक विशेषकर मध्यवर्तीय क्षेत्रा के सब्जी उत्पादकों मे तेजी से प्रचलित हो रही है। इसके लिए कम लागत वाले स्वभाविक रूपसे हवादार (स्वू बवेज दंजनतंससल अमदजपसंजमक चवसलीवनेमे) हरित गृहों का प्रयोग किया जाता है तथा गर्मियों व बरसात मे जब तापमान व आर्द्रता बढ़ने लगती है तब बाहरी छायादार जालियों का परयोग पालीहाऊस के ऊपर से किया जाता है । इस तकनीक द्वारा उत्पादन के लिए मुख्य सिफारिशें निम्नलिखित हैः
किस्म ः इन्दिरा (संकर किस्म)
भूमि मिश्रण ः मिट्टी (दो भाग) : गोबर की खाद/कम्पोस्ट (एक भाग) व रेत (एक भाग) का मिश्रण
पौध् रोपाई का समय ः जनवरी व जुलाई
मलिचग ः काली पालीथीन मल्च
सिंचाई ः गर्मियों मे प्रत्येक दिन, सर्दियों में हर दूसरे दिन
दूरी ः 45*30 सैं. मी.
खाद व उर्वरक ः भूमि मिश्रण में रोपाई से पहले 50 कि. ग्रा/हैक्टेयर की दर से नत्राजन, फास्फोरस व पोटाश मिलाऐं ।

फर्टिगेशन (पानी के साथ खाद)

पानी में कोई भी घुलनशील मिश्रित खाद या उर्वरक जैसे पोलीफीड (19ः19ः19ः) 150 कि. ग्रा. /हैक्टेयर की दर से सप्ताह में दो बार सिंचाई के साथ करें। फर्टिगेशन रोपाई के बाद तीसरे सप्ताह शुरू करें व अन्तिम तुड़ाई से 15 दिन पहले बन्द कर दें। यदि पोलीफीड (19ः19ः19ः एन. पी. के.) का प्रयोग करें तो 2.22 ग्रा. /वर्गमीटर की दर से सप्ताह में दो बार पानी का घोल प्रत्येक फर्टिगेशन के लिए उपयुक्त है 7 ग्रा. / 10 लीटर पानी तथा प्रत्येक पौधे के साथ अवस्था के अनुसार 100-250 मि. ली. घोल डालें।
कांट-छांट: पौधें में कांट-छांट करें व प्रमुख तने ही रखें ताकि फल भी अच्छे आकार व गुणवत्ता के लगे। अध्कि ऊंचाई बढ़ने पर पौधे को खड़ा रहने के लिए उचित सहारा भी दें।
तुड़ाईः पालीहाऊस में शिमला मिर्च की उन किस्मों के उत्पादन को बढ़ावा दिया जाता है जो लम्बी अवधि की तुड़ाई में सहायक हो। समान्यतः तुड़ाई की अवधि 2-3 माह (दो बार उत्पादन के लिए) पायी गई है।
पैदावार: 65-70 टन/हैक्टेयर
जल संग्रहण तकनीकी द्वारा सब्ज़ी उत्पादन में वृद्धि
पाॅलीहाऊस में शिमला मिर्च की बिमारियों की रोकथाम लक्षण
1. पौध् का कमरतोड़ रोगः  
रोगकारक: पीथियम व फाइटोफ्रथोरा की प्रजातियां पौध् भूमि की सतह से निकलने से पहले और उसके बाद मर जाती है। संक्रमित पौध् सतह पर लुढ़क जाती है। क) पौध्शाला को जालीनुमा घर में ही उगाएं। ख) पौध्शाला की जगह प्रति वर्ष बदल दें । ग) पौध्शाला की मिट्टी को फाॅर्मलिन ;1 भाग फार्मालिन : 7 भाग पानीद्ध से उपचारित करने के उपरान्त मिट्टी को पाॅलीथान की चादर से 7 दिनों तक ढक कर रखें तथा उसके उपरान्त चादर को हटा दें और 10 से 15 दिनों तक अच्छी तरह मिट्टी को हिलाएं ताकि दवाई का ध्ुआं अच्छी तरह निकल जाए। घ) बीजाई से पहले बीज को कैप्टान (3ग्रा./कि.ग्रा. बीज) से उपचारित करें। ड) जब पौध् 7 से 10 दिन की हो जाए उसकी मैन्कोजेब (25 ग्रा. प्रति 10 लीटर पानी) तथा कार्बेण्डाजिम (10ग्रा. प्रति 10 लीटर पानी) से सिंचाई करें।
2. चूर्णी फफूंद रोग:  
रोगकारक: पौधें की ऊपरी सतह पर हल्के सफेद रंग के ध्ब्बे पड़ जाते है। तथा उनकी निचली सतह पर पीले रंग के ध्ब्बे बन जाते है । जैसे ही पौधे फल अवस्था में आते हैं उसी समय इन पर हैक्साकाॅनाजोल (5 मि. ली. प्रति 10 लीटर पानी )या कार्बेण्डाजिम (10 ग्रा. प्रति 10 लीटर पानी) का छिड़काव करें और 10-12 दिनों के अन्तराल पर
हरितगृह में माइट की रोकथाम

पहचानः

माइट से ग्रसित पौधे की दूर से ही पहचान की जा सकती है। पत्तों में हल्के पीले ध्ब्बे दिखाई देते है जो कि बाद में भूरे रंग के हो जाते हंै ।

रोकथाम

माइट की रोकथाम के लिए प्रोफेनोफॅास 1 मि. ली. प्रति लीटर पानी में या डाईकोफाॅल 2 मि. ली. प्रति लीटर पानी या पोगेमियां तेल 10 मि. ली. प्रति लीटर पानी में या नीम के बीजों को पानी में मिला कर (5-6 प्रतिशत घोल बनाकर) 10 दिन के अन्तराल पर छिड़काव करना चाहिए। एक ही जीव नाशी का छिड़काव बार-बार नहीं करना चाहिए।

2. टमाटर उत्पादन:

शुष्क शीतोषण, उच्च पर्वतीय शीत मरूस्थलीय क्षेत्रों के लिए
हरित गृह तकनीक

लाहौल घाटी

लाहौल घाटी के लिए अधर्वेलानाकार (क्यूनसेट) हरित गृह जिसका आकार 10 मीटर लम्बा, 3मी. चैडा़ तथा 2-2.15 मी. ऊंचा हो उतम पाया गया है। विभिन्न सब्जियों की पौध् तैयार करने के लिए मार्च के अन्तिम सप्ताह से मध्य से अप्रैल तक बीज की बुआई करें।

खीरे की जापानीज लौंग ग्रीन, ग्रीन लौंग तथा पाइनसेट किस्मों की अध्कि उपज प्राप्त करने के लिए पाॅलीघर में मई के अन्तिम सप्ताह से जून के तीसरे सप्ताह तक 50*30 सैं. मी. दूरी पर रोपाई करें।

समर स्क्वैश की अध्कि उपज तथा लम्बे समय तक उत्पादन प्राप्त करने के लिए मई के अन्तिम सप्ताह से जुलाई के प्रथम सप्ताह तक 50*40 सैं. मी. की दूरी पर रोपाई करें ।

फसल चक्र

चाईनीज सरसों-खीरा/समर स्क्वैश-चाईनिज़ सरसों
(मार्च-मई) (मई-सितम्बर) (सितम्बर-दिसम्बर)

स्पीति घाटी

स्पीति घाटी में लाहौल घाटी की अपेक्षा कम तापमान के कारण मिट्टी में बनाई ट्रेन्च (खाई) जिसका आकार 10 मी. लम्बा, 5 मी. चैड़ तथा 0.75 मी. गहरा तथा पाॅलीऐन्च हरित गृह जिसका आकार 10 मी. लम्बा, 5 मी. चैड़ा तथा 2.5 ऊंचा हो उतम पाए गये है। विभिन्न पाॅलीऐन्च गर्मियों में सब्जी उत्पादन तथा मिट्टी में बनाई ट्रेन्च (खाई) सर्दियों मे पत्ते वाली सब्जियां के उत्पादन के लिए उचित है ।

टमाटर, मिर्च, खीरा, फूलगोभी तथा बन्दगोभी की रोपाई के लिए मध्य अप्रैल मई तक उचित समय है ।

फसल चक्र

फूलगोभी - टमाटर (अप्रैल-जुलाई)(जुलाई-अक्तूबर) बन्दगोभी/शिमला मिर्च/ खीरा-पालक-पालक
(अप्रैल-जून) (जुलाई-सितम्बर) (अक्तूबर-मार्च)
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